10, जनवरी 2026
राजनीतिक तापमान तेज़ी से बढ़ रहा है। डेनमार्क की कंज़र्वेटिव पार्टी के सांसद रासमस जारलोव ने ट्रंप के बयान पर तीखी आपत्ति जताते हुए इसे चौंकाने वाला और पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। रासमस जारलोव ने कहा कि यह बेहद हैरान करने वाली बात है कि संयुक्त राज्य अमेरिका जैसा सहयोगी देश अपने ही मित्र देशों को सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा है। उन्होंने कहा, “यह अभूतपूर्व है कि आप उन देशों को धमकाएं जिन्होंने कभी आपके खिलाफ कुछ नहीं किया और हमेशा वफादार रहे।” जारलोव ने चेतावनी दी कि अगर डेनमार्क जैसे देश को इस तरह की आक्रामक भाषा का सामना करना पड़ सकता है, तो यह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। उनके शब्दों में, “अगर डेनमार्क सुरक्षित नहीं है, तो कोई भी देश सुरक्षित नहीं है।”
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के तर्कों को खारिज करते हुए जारलोव ने कहा कि वहां से न तो अमेरिका को कोई खतरा है और न ही किसी तरह की शत्रुता। उन्होंने साफ कहा कि ग्रीनलैंड के मामले में किसी भी तरह का बहाना नहीं बनता—न कोई धमकी है और न ही कोई दुश्मनी। चीन की मौजूदगी को लेकर भी डेनिश सांसद ने अमेरिकी दावों को मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड में न चीन का दूतावास है, न खनन गतिविधियां, न स्वामित्व और न ही कोई सैन्य ठिकाना। जारलोव ने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका ने खुद ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी लगभग 99 प्रतिशत तक घटा दी है—जहां कभी 15,000 अमेरिकी सैनिक थे, आज सिर्फ 150 ही बचे हैं। वहीं राष्ट्रपति ट्रंप अपने रुख पर कायम हैं। तेल और गैस कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने डेनमार्क के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि “500 साल पहले नाव उतारने से जमीन की मालिकाना हक नहीं मिलती।” ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने कदम नहीं उठाया, तो रूस और चीन ग्रीनलैंड पर कब्जा कर सकते हैं।
उन्होंने साफ कहा, “हम रूस या चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनने देंगे।”वहीं राष्ट्रपति ट्रंप अपने रुख पर कायम हैं। तेल और गैस कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने डेनमार्क के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि “500 साल पहले नाव उतारने से जमीन की मालिकाना हक नहीं मिलती।” ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने कदम नहीं उठाया, तो रूस और चीन ग्रीनलैंड पर कब्जा कर सकते हैं। उन्होंने साफ कहा, “हम रूस या चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनने देंगे।” और यहीं से यह मामला और गंभीर हो जाता है। ग्रीनलैंड को लेकर यह टकराव अब सिर्फ एक बयान या कूटनीतिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक ताकतों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आक्रामक सोच का प्रतीक बनता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में ग्रीनलैंड केवल रणनीतिक बहस तक सीमित रहेगा, या फिर यह विवाद दुनिया की भू-राजनीति की दिशा ही बदल देगा।
