- ईश्वर धामु
चंडीगढ़, 18 मार्च
हरियाणा में अब हर राजनैतिक दल चुनावी तैयारी में जुट गए हैं. सत्तासीन पार्र्टी भाजपा के सामने चुनौती है तीसरी बार अपने दम पर सत्ता हासिल करना तो विपक्षी दल कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल है कि कैसे सत्ता पाई जाए? पक्ष और विपक्ष का सीधा तारगेट सत्ता की कुर्सी पाना है. कुर्सी के लिए राजनैतिक दल अभी से सांठगांठ में लग गए हैं. भाजपा अपनी आलाकमान के निर्देशों पर चुनाव जीतों अभियान चला रही है तो कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में उनके सांसद बेटे दीपेन्द्र हुड्डा की अगुवाई में सत्ता पाने की लड़ाई लडऩे में लगी हुई है. स्पष्ट है कि भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अबकी बार मान लिया है कि उनका सांसद बेटा अब जवान हो चुका है और पार्टी को राजनैतिक नेतृत्व देने में सक्षम हो गया है. इसीलिए अब कांग्रेस सभी बड़े आंदेालन दीपेन्द्र हुड्डा के नेतृत्व में चला रही है. तो दूसरी ओर भूपेन्द्र सिंह हुड्डा पर राजनीति में पुत्रमोह के आरोप लग रहे हैं. पर इस बार हुड्डा ने भी आरपार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है.
चर्चाकारों का कहना है कि इस बार भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सत्ता में आने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि क्या हुड्डा अपने विरोधी कांग्रेेसी नेताओं में चुनाव में समय अपने पक्ष मेें जा पायेंगे? क्योकि हुड्डा के पार्टी स्तर पर विरोध करने वालों में रणदीप सिंह सुरजेवाला, कुमारी सैलजा, किरण चौधरी, कैप्टन अजय यादव सरीके दिज्गज नेता हैं. यह सही है कि अभी तक कांग्रेसी विधायकों का बड़ा बहुमत हुड्डा के साथ है.यें वे विधायक हैं, जिन्होने किसी ने किसी रूप में हुड्डा के शासनकाल में सत्ता सुुख भोगा है. पर चुनाव के समय समीकरण क्या बनते हैं, कांग्रेस का सत्ता भविष्य उस पर निर्भर करेगा. इसी बीच राजनैतिक गलियारों में सिरसा से हलोपा विधायक गोपाल कांडा की चर्चाएं भी उठने लगी है. अब अचानक कांडा के दिल में कांग्रेस प्रेम उमडऩे लगा है. मीडिया में भी कांडा के कांग्रेस प्रेम की चर्चाएं गरमा गरम परोसी जा रही है. हालांकि अभी तक विधायक गोपाल कांडा की ओर से इस बारे में सीधे तौर से कोई संकेत नहीं आ रहा है. परन्तु उनसे जुड़े सूत्र कांग्रेस और कांडा को लेकर सोशल मीडिया पर अवश्य सक्रिए हो रहे हैं.

हालांकि 2019 के चुनाव में जब भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो गोपाल कांडा ने भाजपा के लिए बहुमत जूटाने के लिए सार्थक प्रयास किए थे. कुछ विधायकों को वें बातचीत के लिए अपने हवाई जहाज मेें लेकर भी गए थे. उस वक्त लगता था कि भाजपा के सत्ता में आते ही गोपाल कांडा को मंत्री पद से नवाजा जायेगा. परन्तु इसी बीच भाजपा के कुछ प्रभावी बड़े नेताओं ने कांडा का खुला विरोध करना शुरू कर दिया था. इस कारण कांडा को कोई राजनैतिक लाभ का पद नहीं मिल पाया और इसी कसमकश में विधायक रणजीत सिंह चौटाला केबिनेट मंत्री का पद हथिया ले गए. गोपाल कांडा के समर्थकों को यह रास नहीं आया और कार्यकर्ताओं ने उन पर दबाव बनाना प्रारम्भ कर दिया. पर कांडा कार्यकर्ताओं के विरोध को दरकिनार करते हुए अपने आरएसएस से पुराने सम्बंध बताते रहे. पर उनको इसका प्रत्यक्ष रूप से कोई लाभ नहीं मिल पाया. लेकिन इसमें भी कोई दोराय नहीं है कि गोपाल कांडा का सिरसा जिले की सिरसा, रानिया और ऐलनाबाद विधानसभा सीटों पर अपना प्रभाव है. इस कारण वें सिरसा लोकसभा सीट पर भी बड़ा गेम बजा सकते हैं। वें इन सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं. ताजा जानकारी के अनुसार अब गोपाल कांडा का भाजपा से मोहभांग हो रहा है. दूसरी ओर ऐलनाबाद उप चुनाव के प्रचार अभियान मेें भूपेन्द्र सिंह हुड्डा द्वारा कांडा को अपना भाई कहने को भी नए घटनाक्रम से जोड़ कर देखा जा रहा है. बताया गया है कि गोपाल कांडा अब कांग्रेस से प्रे्रम पिंग बढ़ा रहे हैं. चर्चाकारों का कहना है कि कांडा इन्ही दिनों में दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेताओंं से भी मिले हैं। वैसे हुड्डा के प्रति कांडा का लगाव पुराना है. हुड्डा ने 2009 में कांडा को मंत्री बनाया था. कहा जा रहा है कि सत्ता पाने के लिए कांग्रेस के लिए एक-एक सीट मायने रखती है. सम्भव है कि कांग्रेस चुनाव में बाजी पलटने को कांडा से हाथ मिला ले?