
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में राज्य विधानसभा में दिए गए एक बयान के कारण काफी विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने सदन में कहा, “मिया मुसलमान को असम पर कब्जा करने नहीं दूंगा,” जिससे विपक्षी दलों में भारी आक्रोश फैल गया। यह बयान उस समय आया जब विपक्ष ने असम में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए।
सरमा ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि उनकी सरकार असम की संस्कृति, पहचान और अस्मिता की रक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि राज्य में किसी भी प्रकार के जनसांख्यिकीय असंतुलन को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और जो भी असम की सांस्कृतिक विरासत को खतरे में डालने की कोशिश करेगा, उसे सख्ती से निपटा जाएगा। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी सरकार राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक अखंडता की रक्षा के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद सदन में जोरदार हंगामा हुआ। विपक्षी दलों ने इस बयान को न केवल साम्प्रदायिक बल्कि समाज में विभाजन पैदा करने वाला बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री से अपने बयान के लिए माफी मांगने की मांग की और आरोप लगाया कि सरमा का यह बयान राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण को और बढ़ावा देगा।
हिमंत बिस्वा सरमा ने विपक्ष की आलोचना का कड़ा जवाब दिया और अपने बयान पर अडिग रहे। उन्होंने कहा कि यह बयान राज्य की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए आवश्यक था। सरमा ने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार असम के लोगों की भावनाओं और उनके हितों को प्राथमिकता देती है और किसी भी बाहरी या आंतरिक ताकत को असम की शांति और समृद्धि को भंग नहीं करने देगी।
इस बयान ने असम की राजनीति में साम्प्रदायिक मुद्दों को एक बार फिर से गरमा दिया है। विपक्षी दलों और सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने सरमा के बयान की कड़ी निंदा की है और राज्य में शांति बनाए रखने की अपील की है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस बयान का असम की राजनीति और समाज पर क्या असर पड़ता है, खासकर जब राज्य में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच पहले से ही तनाव चल रहा है।