‘हमको उनसे है वफा की उम्मीद जो नहीं जानते वफा क्या है

पहला हिस्सा संघ (RSS) की आलोचना पर आधारित है, जिसमें इसे “प्रतिगामी सोच” का संगठन बताया गया है। प्रतिगामी का मतलब होता है पीछे की ओर देखने वाला या प्रगति के विरोध में खड़ा होना। आलोचक यह कहना चाहते हैं कि संघ की विचारधारा प्राचीन या रूढ़िवादी है, जो आधुनिक समय की चुनौतियों और समाज की बदलती जरूरतों के साथ सामंजस्य नहीं रखती। इस तरह के संगठनों का उद्देश्य समाज में पहले से मौजूद पुरानी परंपराओं और विचारों को बचाए रखना होता है, भले ही वे विचार प्रगति या बदलाव के अनुकूल न हों।
दूसरे हिस्से में यह कहा गया है कि “सत्ता का सुख” अभी संघ को प्राप्त हुआ है। इसका मतलब है कि संघ के समर्थक अब सत्ता में हैं और वे अपनी विचारधारा को कार्यान्वित करने की स्थिति में हैं। आलोचक अरविंद जी को यह सुझाव दे रहे हैं कि उन्हें संघ के इस नजरिए को ध्यान में रखकर उनके सवालों पर विचार करना चाहिए। यानी, जब एक संगठन सत्ता में आता है, तो उसके कामकाज और निर्णय उसकी वैचारिक नींव पर आधारित होते हैं, और इस बात को ध्यान में रखकर ही उनकी आलोचना या सवाल करने चाहिए।
दूसरे हिस्से में एक शेर का उल्लेख किया गया है: “हमको उनसे है वफा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है।” इसका गहरा अर्थ यह है कि आप उन लोगों से वफादारी या ईमानदारी की उम्मीद कर रहे हैं जो खुद वफादारी का मतलब नहीं समझते। यह शेर दरअसल उन लोगों या संगठनों पर कटाक्ष करता है जिनसे आप ईमानदारी, पारदर्शिता या नैतिकता की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन वे स्वयं उन मूल्यों पर विश्वास नहीं करते।
इस संदर्भ में यह शेर संघ और उसकी विचारधारा के लिए इस्तेमाल किया गया है। बयानकर्ता यह कहना चाहते हैं कि संघ के बारे में यह उम्मीद रखना कि वे वफादारी या नैतिकता के कुछ विशेष मापदंडों पर खरे उतरेंगे, एक भ्रम हो सकता है। वे उस तरीके से काम करेंगे जो उनकी विचारधारा के अनुकूल है, न कि किसी बाहरी व्यक्ति की अपेक्षाओं के अनुसार।
निष्कर्ष: इस पूरे बयान में संघ की विचारधारा और सत्ता में उसकी भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, और अरविंद जी को यह सलाह दी जा रही है कि वे संघ से किसी विशेष प्रकार की अपेक्षा करने से पहले उसकी सोच और विचारधारा को समझें।