
खैर, 15 नवंबर 2024 – उत्तर प्रदेश की खैर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में इस बार समीकरण बदलते हुए नजर आ रहे हैं। भा.ज.पा. और सपा के बीच सीधे मुकाबले की स्थिति बन गई है, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। 2022 में बसपा की प्रत्याशी रही चारू केन, इस बार सपा से चुनावी मैदान में हैं। यह 1992 में समाजवादी पार्टी (सपा) की स्थापना के बाद पहली बार है, जब सपा सीधे तौर पर खैर सीट पर चुनावी मुकाबले में है।
भा.ज.पा. के लिए चुनौती: गुटबाजी और राजनीतिक विरासत की रक्षा
खैर विधानसभा में भा.ज.पा. के लिए यह उपचुनाव अपने राजनीतिक कब्जे को बनाए रखने का एक बड़ा इम्तिहान बन चुका है। भा.ज.पा. के प्रत्याशी सुरेंद्र दिलेर के लिए यह एक राजनीतिक विरासत को कायम रखने की चुनौती है, क्योंकि पार्टी यहां पहले से ही सत्ता में है। हालांकि, भाजपा के लिए स्थिति थोड़ी कठिन है, क्योंकि पार्टी को अपनी अपनी आंतरिक गुटबाजी और दलित वोटों में बिखराव का सामना करना पड़ रहा है।
बसपा का संघर्ष: तीसरे कोण के रूप में संघर्ष
बसपा की स्थिति इस बार थोड़ी कमजोर नजर आ रही है। पिछले पांच चुनावों में, एक बार जीत और चार बार दूसरे स्थान पर रहने वाली बसपा, इस बार सीधे मुकाबले में तीसरे कोण के रूप में नजर आ रही है। पार्टी के लिए दलित वोटों का बिखराव एक बड़ी चुनौती बन चुका है, जिससे बसपा को अपनी स्थिति मजबूत करने में परेशानी हो रही है।
इस बार के चुनाव में बसपा को सपा और भा.ज.पा. के बीच चुनावी लड़ाई में तीसरे स्थान पर रहते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने का संघर्ष करना पड़ सकता है।
खैर का जातीय समीकरण: भाजपा की रणनीति
खैर विधानसभा क्षेत्र जातीय समीकरणों के लिए जाना जाता है, और इस बार भाजपा अपनी चुनावी रणनीति में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। भाजपा का उद्देश्य खैर सीट पर जाट बहुल इलाके का समर्थन अपने पक्ष में करना है। भाजपा के ध्रुवीकरण की रणनीति में विशेष रूप से जाटों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की जा रही है, ताकि भाजपा की स्थिति मजबूत हो सके।
खैर की स्थिति: विकास कार्य और क्षेत्रीय मुद्दे
खैर विधानसभा क्षेत्र हरियाणा के पलवल और यूपी के गौतमबुद्धनगर और मथुरा जिले की सीमा से सटा हुआ है, जो आगामी समय में एक महत्वपूर्ण विकास क्षेत्र बनकर उभरने वाला है। डिफेंस कॉरिडोर, राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, और ग्रेटर अलीगढ़ जैसे विकास कार्यों की योजना इस क्षेत्र में चल रही है। साथ ही, यमुना एक्सप्रेसवे और ट्रांसपोर्ट नगर जैसी योजनाओं के चलते खैर का क्षेत्र तेजी से विकासशील बन रहा है। हालांकि, इन विकास योजनाओं का चुनाव में कोई बड़ा प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा है, क्योंकि जातीय समीकरण ही मुख्य चुनावी मुद्दा बन चुका है।
भा.ज.पा. का जातीय समीकरणों पर जोर
भा.ज.पा. इस समय ध्रुवीकरण की रणनीति को लेकर सक्रिय है, और पार्टी जाट, सवर्ण, और अन्य पिछड़े वर्गों के वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत है। हालांकि, इस संघर्ष में सपा भी पीछे नहीं है और जाट और मुसलमानों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा, बसपा भी अपनी दलित राजनीति को मजबूती से पेश करने की कोशिश कर रही है।
जातीय समीकरण और ध्रुवीकरण की रणनीति अहम भूमिका निभाएंगे
खैर विधानसभा उपचुनाव में इस बार समीकरण काफी बदल गए हैं, जहां भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला है, वहीं बसपा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव में जातीय समीकरण और ध्रुवीकरण की रणनीति अहम भूमिका निभाएंगे, जो भाजपा और सपा के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। खैर सीट अब भा.ज.पा. और सपा के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुकी है, और यह उपचुनाव आगामी विधानसभा चुनावों का प्रीव्यू साबित हो सकता है।