
नई दिल्ली, 17 नवंबर – उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की सीसामऊ विधानसभा सीट इन दिनों सपा और भाजपा के लिए नाक का सवाल बन चुकी है। इस सीट पर 20 नवंबर को उपचुनाव होने जा रहे हैं, और राजनीतिक गलियारों में इस चुनाव को लेकर दोनों प्रमुख दलों के बीच कांटे की टक्कर देखी जा रही है। खासकर, समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के बीच संघर्ष इस सीट को खास बनाता है।
इस सीट पर सपा के लिए इसे बनाए रखना और भाजपा के लिए इसे जीतना एक प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। सीसामऊ की राजनीति में इस समय मुस्लिम इलाकों में खामोशी का माहौल है, जो चुनावी समीकरण में अहम भूमिका निभा सकता है। यह सीट लंबे समय से सपा का गढ़ रही है, जहां पिछले 25 वर्षों से सपा का वर्चस्व था। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इसे लेकर स्थिति को बदल दिया है, खासकर जब से इस सीट पर चार बार के सपा विधायक इरफान सोलंकी की विधायकी रद्द हुई और वे जेल में बंद हैं।
क्या है पूरा मामला? सपा के एक प्रमुख विधायक थे
इरफान सोलंकी, जो कि सपा के एक प्रमुख विधायक थे, पर भ्रष्टाचार और अन्य गंभीर आरोपों के चलते उनकी विधायकी रद्द कर दी गई थी। इसके बाद से सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव की जरूरत पड़ी। सोलंकी के जेल में होने और उनकी राजनीतिक जमीन कमजोर होने के बावजूद, सपा ने अपनी पूरी ताकत इस सीट पर बनाए रखने के लिए झोंक दी है।
वहीं भाजपा ने इस सीट को जीतने के लिए पूरी रणनीति तैयार की है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले सात दिनों में इस विधानसभा क्षेत्र का दो बार दौरा किया है। यह भाजपा के लिए इस सीट को जीतने की महत्वपूर्ण चुनौती बन गई है। सीएम योगी ने इस क्षेत्र में अपनी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कई रैलियाँ और जनसंपर्क अभियान चलाए हैं।
सपा और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर
सीसामऊ सीट पर इस समय दो प्रमुख दलों – समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी – के बीच सीधी टक्कर चल रही है।
- समाजवादी पार्टी: सपा ने इस सीट को अपने गढ़ के रूप में देखा है, और इरफान सोलंकी के समर्थकों को साधने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंकी है। पार्टी ने इस सीट को बचाने के लिए रणनीतिक रूप से मुस्लिम समुदाय के समर्थन को मजबूत करने की कोशिश की है। हालांकि, जेल में बंद सोलंकी के मुद्दे ने स्थिति को जटिल बना दिया है, क्योंकि उनके समर्थन में बिखराव की संभावना भी जताई जा रही है।
- भारतीय जनता पार्टी: भाजपा ने इसे “नाक का सवाल” बना लिया है। पार्टी का लक्ष्य सिर्फ सपा का गढ़ तोड़ना ही नहीं, बल्कि प्रदेश में अपनी पकड़ को और मजबूत करना भी है। भाजपा के रणनीतिक कदमों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का क्षेत्रीय दौरा, पार्टी की ओर से बड़े नेताओं की सक्रियता और मुद्दों को लेकर प्रचार करना शामिल है। भाजपा इस सीट पर अपना काबिज होना चाहती है, खासकर पिछली विधानसभा चुनावों में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन के बाद।
मुस्लिम इलाकों में खामोशी की चादर
सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं का एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है, जो चुनावी परिणाम में बड़ा असर डाल सकता है। लेकिन इस बार मुस्लिम इलाकों में खामोशी का माहौल है, जिससे दोनों प्रमुख दलों के लिए समीकरण बदलने की संभावना बन रही है। मुस्लिम समुदाय का वोट सपा के पक्ष में रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय में भाजपा ने विभिन्न रणनीतियों के जरिए इस वोट को अपनी ओर खींचने की कोशिश की है।
भाजपा की कोशिश है कि वह मुस्लिम समुदाय के बीच सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों को प्रमुखता से प्रचारित कर उन्हें अपने पक्ष में लाए। वहीं, सपा इस खामोशी को समझते हुए अपनी पुरानी रणनीतियों का सहारा ले सकती है।
उपचुनाव की अहमियत
इस उपचुनाव को लेकर राज्य के राजनीतिक माहौल में भी काफी हलचल मच गई है। दोनों ही दल इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई मान रहे हैं। सपा के लिए यह सीट अपनी सत्ता को बनाए रखने और क्षेत्रीय नेतृत्व को साबित करने का मौका है, वहीं भाजपा के लिए यह लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी में अपनी ताकत को दिखाने का एक मंच है।
इस बीच, खामोशी की चादर और कांटे की टक्कर का मतलब यह है कि सीसामऊ विधानसभा उपचुनाव में कोई भी दल आराम से जीतने की स्थिति में नहीं है। 20 नवंबर को होने वाले मतदान से ही यह साफ हो पाएगा कि यह सीट किस दल के खाते में जाती है।
निष्कर्ष
सीसामऊ विधानसभा उपचुनाव भाजपा और सपा दोनों के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। इस सीट को लेकर दोनों दलों में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है, और यह आगामी चुनावों में राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने वाला हो सकता है। 20 नवंबर को होने वाले मतदान के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि यह सीट किस पार्टी के खाते में जाती है, और इसका उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।