
नई दिल्ली, 28 नवंबर 2024 / दिल्ली और एनसीआर (नेशनल कैपिटल रीजन) में बढ़ते प्रदूषण ने लोगों की जिंदगी मुश्किल बना दी है। जहरीली हवा के कारण बच्चों, खासकर मासूमों के लिए घरों से बाहर निकलना खतरनाक हो गया है। हर कोई डरा हुआ है कि कहीं प्रदूषण के कारण उनके बच्चे बीमार न पड़ जाएं। दिल्ली में विधानसभा चुनाव नजदीक होने के कारण सरकारें इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाने से बच रही हैं, जबकि लोग, खासकर बच्चे, प्रदूषण के कारण गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
राजनीतिक फायदे के लिए प्रदूषण पर अनदेखी
दिल्ली में प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है, लेकिन राज्य सरकारें इसके समाधान के लिए कोई प्रभावी कदम उठाने में असमर्थ दिखाई दे रही हैं। चुनावी मौसम में किसी भी पार्टी को प्रदूषण पर कड़े कदम उठाने का मन नहीं है, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे वोटों पर असर पड़ेगा। प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि बच्चों को घरों से बाहर निकलने से मना किया जा रहा है, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। स्कूलों की छुट्टियां तो घोषित की जा रही हैं, लेकिन इसके बाद भी लोग घरों में बंद रहने को मजबूर हैं।
सरकारी नीतियों में लापरवाही और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोक का अभाव
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कई बार बयान दिए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि पुरानी और प्रदूषण फैलाने वाली सरकारी बसें और अन्य वाहन धड़ल्ले से चल रहे हैं। दिल्ली में डीजल वाहनों के खिलाफ कड़े नियमों का दावा किया गया था, लेकिन इन्हें सही से लागू नहीं किया जा रहा। 20 साल पुरानी गाड़ियां जो प्रदूषण फैला रही हैं, खुलेआम सड़कों पर दौड़ रही हैं, और इस पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, उनका वास्तविक असर बहुत कम हो रहा है।
कानूनी कार्रवाई की लापरवाही, न्यायालयों द्वारा फटकार
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने प्रदूषण के मुद्दे पर सरकारों को कई बार फटकार लगाई है, लेकिन इसके बावजूद कोई असर दिखाई नहीं दे रहा। प्रदूषण का स्तर दिल्ली और एनसीआर के अलावा हरियाणा के गुरुग्राम, फरीदाबाद, बहादुरगढ़, और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा जैसे इलाकों में लगातार बढ़ रहा है। इन क्षेत्रों में सांस की समस्याओं, खांसी और दमा से परेशान मरीज अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं, और कई मरीजों की हालत गंभीर हो चुकी है। फिर भी सरकारें और प्रशासन प्रदूषण पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय इसे नजरअंदाज कर रहे हैं।
वोटों की राजनीति और प्रदूषण पर अनदेखी
यह स्थिति पूरी तरह से राजनीतिक लाभ की वजह से हो रही है। प्रदूषण और स्वास्थ्य के मुद्दों पर सरकारें वोटों की राजनीति में इतनी उलझी हुई हैं कि उन्हें आम नागरिकों की चिंता नहीं है। प्रदूषण की रोकथाम के लिए किसी भी सख्त कदम की बजाय, चुनावी प्रचार और अपने राजनीतिक फायदे की चिंता की जा रही है। बड़े नेताओं की गाड़ियां, जो 20 साल पुरानी हैं और प्रदूषण फैला रही हैं, खुलकर चल रही हैं। इस पर कोई नियम लागू नहीं हो रहा है, और न ही प्रशासन इस पर कोई कठोर कदम उठा रहा है।
अस्पतालों में बढ़ते मरीज और नागरिकों की परेशानी
दिल्ली-एनसीआर के अस्पतालों में प्रदूषण के कारण बढ़ते मरीजों की संख्या चिंता का विषय बन गई है। दमघोटू हवा और खराब गुणवत्ता के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और बढ़ रही हैं, खासकर दमा, खांसी और सांस लेने में तकलीफ की समस्या। लोग अपने घरों और ऑफिसों में बंद हो रहे हैं, क्योंकि बाहर का वातावरण खतरनाक हो चुका है। लेकिन सरकारें इससे निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बना रही हैं।
आखिर प्रदूषण के इस गंभीर संकट से कब निजात मिलेगी? क्या
अब यह सवाल उठता है कि आखिर प्रदूषण के इस गंभीर संकट से कब निजात मिलेगी? क्या सरकारें और राजनीतिक दल प्रदूषण से बचाव के लिए कुछ ठोस कदम उठाएंगे या फिर वोटों की राजनीति में यह समस्या और गहरे सियासी रंग में रंगी रहेगी? यदि सरकारें जल्दी कोई प्रभावी कदम नहीं उठातीं तो आने वाले समय में प्रदूषण से जनस्वास्थ्य पर और भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जो सिर्फ दिल्ली और एनसीआर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में इसका असर महसूस होगा।
यह वक्त है कि सरकारें प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाएं ताकि लोगों को स्वच्छ हवा मिले और आने वाली पीढ़ियां इस संकट से मुक्त हो सकें।