मां-बाप की देखभाल न करने पर संपत्ति में अधिकार नहीं

कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
नई दिल्ली, 14 जनवरी 2025: देश में बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा और उनके साथ दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाओं के बीच अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जो संतान अपने माता-पिता की देखभाल करने से इनकार करती है या उनके साथ दुर्व्यवहार करती है, उसे माता-पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलेगा। यह फैसला माता-पिता के अधिकारों को संरक्षित करने और संतानों के कर्तव्यों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
फैसले का आधार:
यह मामला एक बुजुर्ग दंपति की याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने अपनी संतानों पर उपेक्षा और दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। दंपति ने अदालत से अपील की थी कि उन्हें संपत्ति से वंचित किया जाए।
अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा:
- माता-पिता की देखभाल करना संतानों का कर्तव्य है:
भारतीय संविधान और कानूनों के तहत बच्चों का यह नैतिक और कानूनी दायित्व है कि वे अपने माता-पिता की देखभाल करें। - संपत्ति का अधिकार उन्हीं को मिलेगा जो देखभाल करेंगे:
यदि कोई संतान अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करती है, तो उसे माता-पिता की अर्जित संपत्ति में कोई हिस्सा पाने का अधिकार नहीं होगा। - माता-पिता को वसीयत बदलने का अधिकार:
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता अपनी संपत्ति के संबंध में वसीयत में बदलाव कर सकते हैं और उस संतान को वंचित कर सकते हैं जो उनकी देखभाल नहीं करता।
कानून में प्रावधान:
यह फैसला “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007” के तहत दिया गया। इस अधिनियम के अनुसार:
- बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं।
- यदि बच्चे ऐसा करने में असमर्थ रहते हैं, तो कानून उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकता है।
- माता-पिता को यह अधिकार है कि वे अपनी संपत्ति उन बच्चों को ना दें जो उनका सम्मान या देखभाल नहीं करते।
फैसले का उद्देश्य:
इस फैसले का मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करना है। यह फैसला उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहां बच्चे अपने माता-पिता को आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं।
समाज पर असर:
- बुजुर्गों के अधिकारों की सुरक्षा:
यह निर्णय उन माता-पिता को राहत देगा जो अपनी संतानों द्वारा उपेक्षित और प्रताड़ित होते हैं। - संतानों की जिम्मेदारी पर जोर:
फैसला संतानों को यह याद दिलाने के लिए है कि माता-पिता की देखभाल करना केवल कानूनी दायित्व ही नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। - सामाजिक जागरूकता:
यह फैसला समाज में बुजुर्गों के प्रति सम्मान और देखभाल की भावना को प्रोत्साहित करेगा।
न्यायालय की टिप्पणी:
फैसले के दौरान न्यायाधीश ने कहा:
“माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश में अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। यह संतानों की जिम्मेदारी है कि वे अपने माता-पिता की देखभाल करें। जो बच्चे इस कर्तव्य का पालन नहीं करते, उन्हें संपत्ति में अधिकार का दावा करने का भी कोई हक नहीं है।”
प्रभावित परिवारों के लिए संदेश:
यह फैसला उन माता-पिता के लिए उम्मीद की किरण है जो संतानों की उपेक्षा और दुर्व्यवहार का सामना कर रहे हैं। साथ ही, यह संतानों को यह चेतावनी है कि माता-पिता की सेवा और सम्मान में ही उनके अधिकार निहित हैं।
यह ऐतिहासिक फैसला समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और माता-पिता के अधिकारों की सुरक्षा में एक अहम भूमिका निभाएगा। अदालत का यह कदम उन परिवारों के लिए सबक है जो बुजुर्गों की अनदेखी करते हैं और संपत्ति के लालच में संबंधों को भुला देते हैं।