शिवहर 13 फरवरी -शब-ए-बारात की आज रात है। इस्लाम में शब-ए-बारात की खास अहमियत है। इस्लामिक कैलेंडर के लिहाज से आठवां यानी शाबान के महीने की 15वीं तारीख की रात में शब-ए-बारात मनाई जाती है, जो आज गुरुवार को देश भर में मनाई जा रही है।जिंदगी और मौत का सारा हिसाब-किताब शब-ए-बारात पर होता है।
इसीलिए शब-ए-बारात इबादत, फजीलत, रहमत और मगफिरत की रात मानी जाती है,यह रात अल्लाह अपने बंदों के लिए एक नया मौका देता है कि वे अपने अतीत की गलतियों को सुधारें और नेक रास्ते पर चलें।
अल्लाह की इबादत करते हैं–
शब-ए-बारात गुरुवार शाम को मगरिब की अजान होने के साथ मुसलमान मनाना शुरू कर देते हैं, पूरी रात अल्लाह की इबादत करते हैं और शुक्रवार को शाबान का रोजा रखते हैं।शब-ए-बारात अरबी भाषा का शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है।पहला शब है, जिसका अर्थ रात है जबकि ‘बरात’ के मायने क्षमा है। इस तरह से माफी की रात भी कही जा सकती है। इसीलिए लोग रात भर इबादत करते हैं और अल्लाह अपने बंदों की हर एक दुआ कुबूल करता है। इसी कारण इस रात हर कोई अपने गुनाहों की माफी मांगता है।
गडहिया निवासी महबूब आलम ने बताया –
इस्लाम में कई रातें ऐसी हैं, जो बाकी की सभी रातों से ज्यादा अहमियत रखती हैं। इनमें शब-ए-कद्र की पांच रातें, जो रमजान के तीसरे अश्रे में आती हैं. ये रमजान की 21, 23, 25, 27 और 29 तारीख की रात हैं। इसके अलावा मेअराज की रात और शब-ए-बारात की रात है. इस्लाम में ये सात रातों की अपनी अहमियत और फजीलत है। इन सभी सातों रातों में मुस्लिम समुदाय के लोग पूरी रात अल्लाह की इबादत करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं।
कब्रिस्तान भी जाते हैं, जहां पर फातिहा पढ़ते हैं-
मोहम्मद महबूब आलम ने बताया है कि शब-ए-बारात की रात पर इंसानों की मौत, रिज्क और उनकी जिंदगी के फैसले अल्लाह लिखते है ।अल्लाह अपने बंदों के अगले साल की तकदीर का फैसला लिखता है। इस रात को अल्लाह के जानीब से बंदों के लिए रोजी-रोटी, हयात-व-मौत व दिगर काम की सूची तैयार (फेहरिस्त) की जाती है।इसलिए यह रात दुआ करने और अल्लाह से भलाई मांगने के लिए बहुत अहम मानी जाती है।मुस्लिम समुदाय के लोग रात भर जागकर न सिर्फ अपने गुनाहों से तौबा करते हैं बल्कि अपने उन बुजुर्गों की मगफिरत के लिए भी दुआ मांगते हैं, जिनका इंतकाल (निधन) हो चुका होता है। इसीलिए लोग इस मौके पर कब्रिस्तान भी जाते हैं, जहां पर फातिहा पढ़ते हैं.
हदीस में कहा गया कि अल्लाह-
हदीस में कहा गया कि अल्लाह इस रात अपनी रहमत के दरवाजे खोल देता है. मगरिब की आजान यानि सूरज डूबने से लेकर फज्र की नमाज सूरज उगने तक अपने बंदों पर खास रहमत की नजर करता हैं।अल्लाह पूछता है कोई ऐसा है जो अपने गुनाहों से माफी मांगे और मैं उसे बख्श दूं, है कोई रोजी का तलबगार, जिसे रोजी दूं, है कोई मुसीबत का मारा, जिसे मैं निजात दूं. यह सिलसिला सुबह फजर तक जारी रहता है।