दिल्ली15 फरवरी – दिल्ली की राजनीति में अगले मुख्यमंत्री को लेकर अटकलें तेज़ हो गई हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, इस बार सांसदों को दरकिनार करते हुए केवल विधायकों में से ही मुख्यमंत्री चुना जाएगा। इस दौड़ में सबसे आगे नाम वर्मा का बताया जा रहा है, जो लंबे समय से पार्टी के विश्वसनीय नेता माने जाते हैं और मजबूत संगठनात्मक पकड़ रखते हैं।
सांसदों को क्यों किया जा रहा नजरअंदाज?
दिल्ली में पार्टी नेतृत्व इस बार लोकसभा सांसदों को राज्य की राजनीति से दूर रखना चाहता है। इसका मुख्य कारण आगामी आम चुनावों की तैयारियां बताई जा रही हैं, जहां सांसदों को राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की रणनीति को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। इसके अलावा, पार्टी हाईकमान का मानना है कि दिल्ली की राजनीति को बेहतर ढंग से चलाने के लिए अनुभवी विधायकों को मौका देना अधिक उपयुक्त होगा।
विधायकों में वर्मा सबसे आगे
मुख्यमंत्री पद की रेस में वर्मा का नाम सबसे प्रबल दावेदार के रूप में उभर रहा है। वर्मा पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और दिल्ली की राजनीति में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। उनकी छवि एक ईमानदार और कुशल प्रशासक की है, जो सरकार और संगठन के बीच संतुलन बनाए रखने में सक्षम माने जाते हैं।
अन्य संभावित दावेदार
हालांकि, वर्मा के अलावा कुछ अन्य विधायकों के नाम भी चर्चा में हैं। इनमें सिंह और गुप्ता जैसे नेताओं के नाम शामिल हैं, जो अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखते हैं और पार्टी संगठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक, शीर्ष नेतृत्व वर्मा को प्राथमिकता दे सकता है, क्योंकि उनकी छवि व्यापक स्तर पर स्वीकार्य मानी जा रही है।
क्या कहता है पार्टी नेतृत्व?
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि “मुख्यमंत्री का चयन पूरी तरह से विधायकों में से ही होगा। सांसदों को इस प्रक्रिया से अलग रखा गया है, क्योंकि हमें दिल्ली में स्थानीय स्तर पर अधिक अनुभवी नेतृत्व की जरूरत है।”
अब देखना यह होगा कि पार्टी कब इस पर आधिकारिक घोषणा करती है और क्या वाकई वर्मा को दिल्ली की कमान सौंपी जाती है या कोई नया नाम सामने आता है।