पटना/रांची, 1 जनवरी 2026
बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी को लेकर करीब ढाई दशक से चला आ रहा विवाद आखिरकार सुलझ गया है। वर्ष 1973 से चले आ रहे इस जटिल मामले पर दोनों राज्यों ने सैद्धांतिक सहमति जता दी है। इस ऐतिहासिक फैसले से न केवल वर्षों पुराना जल विवाद खत्म हुआ है, बल्कि दक्षिण बिहार और झारखंड में सिंचाई और जल प्रबंधन को नई दिशा मिलने की उम्मीद भी जगी है।
कैसे शुरू हुआ था विवाद?
सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर पहला बड़ा समझौता वर्ष 1973 में बाणसागर परियोजना के तहत हुआ था। उस समय मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच समझौता हुआ था, जिसमें बिहार को सोन नदी से कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी का अधिकार दिया गया था।
हालांकि वर्ष 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद सोन नदी के पानी में हिस्सेदारी को लेकर विवाद शुरू हो गया। झारखंड ने पानी में अपना हिस्सा मांगा, जबकि बिहार 1973 के समझौते के आधार पर पूरे 7.75 एमएएफ पानी पर अपना दावा करता रहा।
26 साल तक क्यों नहीं निकल पाया समाधान?
राज्य विभाजन के बाद यह मामला केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों के बीच कई बैठकों में उठा, लेकिन किसी ठोस नतीजे पर सहमति नहीं बन सकी। इसी वजह से यह जल विवाद करीब 26 वर्षों तक लंबित रहा।
पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में बनी सहमति
अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में रांची में हुई पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में इस विवाद पर अंतिम सहमति बन गई। बैठक में तय हुआ कि सोन नदी के कुल 7.75 एमएएफ पानी में से बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2.00 एमएएफ पानी दिया जाएगा। इस फैसले पर दोनों राज्यों की सरकारों ने अपनी सहमति जता दी है।
दक्षिण बिहार की लाइफलाइन है सोन नदी
सोन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक की पहाड़ियों से होता है। यह झारखंड और उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार में प्रवेश करती है और पटना के मनेर के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
यह नदी भोजपुर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, गया, पटना और अरवल जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर सिंचाई का प्रमुख स्रोत है, जिससे लाखों किसानों की आजीविका जुड़ी हुई है।
किसानों और परियोजनाओं को मिलेगा लाभ
इस समझौते के बाद इंद्रपुरी जलाशय परियोजना समेत कई अटकी हुई सिंचाई योजनाओं का रास्ता साफ हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दोनों राज्यों के बीच सहयोग को मजबूत करेगा और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में अहम भूमिका निभाएगा।
पूर्वी भारत के लिए अहम फैसला
कुल मिलाकर, सोन नदी जल विवाद का समाधान पूर्वी भारत में जल संसाधन प्रबंधन की दिशा में एक बड़ा और सकारात्मक कदम माना जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में कृषि, सिंचाई और विकास कार्यों को नई गति मिलने की उम्मीद है।
