अयोध्या 13 फरवरी -अयोध्या के प्रसिद्ध राम मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में सरयू नदी में ‘जल समाधि’ दी गई। यह धार्मिक परंपरा हिंदू सन्यासियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसमें जल को अंतिम विश्राम स्थल के रूप में चुना जाता है।
आचार्य सत्येंद्र दास का जीवन परिचय
आचार्य सत्येंद्र दास का जन्म उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में हुआ था। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में ही धार्मिक ग्रंथों और संस्कृत का गहन अध्ययन किया। 1975 में उन्होंने संस्कृत विद्यालय से ‘आचार्य’ की उपाधि प्राप्त की और इसके बाद एक संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण के सहायक अध्यापक के रूप में कार्य करने लगे। हालांकि, उनका झुकाव हमेशा धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन की ओर रहा, जिससे वे राम जन्मभूमि से गहराई से जुड़ गए।
रामलला की सेवा में 34 वर्षों तक समर्पण
आचार्य सत्येंद्र दास 1 मार्च 1992 को अयोध्या राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी नियुक्त किए गए थे। उन्होंने लगातार 34 वर्षों तक भगवान रामलला की पूजा-अर्चना की और इस दौरान कई ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी बने, जिनमें 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस और राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शामिल हैं। शुरुआत में उनका मानदेय मात्र 100 रुपये था, जो समय के साथ बढ़कर 38,500 रुपये तक पहुंच गया।
उन्होंने अपने सेवा काल में भक्तों को रामलला के दर्शन करवाने और पूजा विधानों का पालन करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में रामलला की सेवा पूरे विधि-विधान और परंपरा के अनुसार होती रही।
सेवानिवृत्ति और अंतिम निर्णय
आचार्य सत्येंद्र दास अब 87 वर्ष के हो चुके थे, और उनकी बढ़ती उम्र को देखते हुए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने उन्हें सेवानिवृत्त करने का निर्णय लिया था। हालांकि, उन्हें आजीवन वेतन और मंदिर में पूजा करने की अनुमति दी गई थी।
उनकी इच्छानुसार, सन्यासी परंपरा का पालन करते हुए उन्हें सरयू नदी में ‘जल समाधि’ दी गई। यह परंपरा दर्शाती है कि एक सन्यासी जल में विलीन होकर प्रकृति में समाहित हो जाता है।
आचार्य सत्येंद्र दास का जीवन भगवान रामलला की सेवा के प्रति समर्पण का प्रतीक था। उनकी सेवा और भक्ति की विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।