दिल्ली 16 अक्टूबर / देश का युवा आखिर कब तक इंतजार करेगा? हाथ में डिग्री है, आंखों में सपने हैं और परिवार को उम्मीद है कि बेटा एक दिन नौकरी करेगा। लेकिन जब नौकरी की तैयारी करते-करते साल निकल जाते हैं, भर्ती परीक्षाओं में देरी होती है और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो उस युवा के मन में एक ही सवाल आता है—आखिर हमारा भविष्य कब बदलेगा? आज देश में बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों की भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दे फिर चर्चा में हैं। इन सवालों ने सरकारों की जिम्मेदारी और युवाओं के भविष्य को लेकर बहस तेज कर दी है। लेकिन सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं है, सवाल उस मेहनत का भी है जो एक युवा कई साल तक करता है। एक गरीब परिवार का लड़का नौकरी की तैयारी के लिए शहर आता है। पिता खेत में मेहनत करते हैं, मां घर चलाने के लिए खर्च में कटौती करती है। बेटा दिन-रात किताबों में लगा रहता है। परिवार को उम्मीद होती है कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद घर की हालत सुधरेगी।
लेकिन जब भर्ती प्रक्रिया में देरी होती है, परीक्षा रद्द होने की नौबत आती है या पेपर लीक जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान उस उम्मीदवार का होता है जिसने अपनी जिंदगी के कीमती साल तैयारी में लगा दिए।अब सवाल है कि ऐसी परिस्थितियों में युवाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा? भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना किसका काम है? और अगर किसी परीक्षा में गड़बड़ी साबित होती है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब होगी?





