गुरुग्राम, 4 सितंबर 2026। अपनी मांगों को लेकर लंबे समय से धरने पर बैठे किसानों को केंद्र सरकार ने एक बार फिर झुनझुना थमाने का काम किया है। शुक्रवार को अलग-अलग राज्यों से आए किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ गुरुग्राम के पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में करीब छह घंटे तक बैठक चली। किसानों को उम्मीद थी कि इस बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी शामिल होंगे, लेकिन उनके बैठक में नहीं पहुंचने से किसानों में नाराजगी साफ दिखाई दी। शाम करीब सात बजे शुरू हुई बैठक रात करीब ग्यारह बजे तक चली। करीब छह घंटे तक किसानों और सरकार के बीच उनकी मांगों को लेकर बातचीत होती रही। किसान अपनी मांगें लेकर पहुंचे थे और उन्हें उम्मीद थी कि इस बार बैठक से कोई ठोस समाधान निकलकर सामने आएगा। लेकिन बैठक खत्म हुई तो एक बार फिर किसानों के हाथ में ठोस फैसला नहीं, बल्कि आश्वासन ही आया ।
अहम मुद्दा भारत-अमेरिका ट्रेड डील से कृषि और डेयरी क्षेत्र को बाहर रखने का था।
कृषि और डेयरी को इस डील से बाहर रखा जाएगा
किसानों ने बैठक में अपनी प्रमुख मांगें सरकार के सामने रखीं। सबसे अहम मुद्दा भारत-अमेरिका ट्रेड डील से कृषि और डेयरी क्षेत्र को बाहर रखने का था। किसानों को डर है कि अगर कृषि और डेयरी क्षेत्र इस व्यापार समझौते की चपेट में आता है तो इसका सीधा नुकसान देश के किसानों और डेयरी कारोबार से जुड़े लोगों को हो सकता है। सरकार ने यहां भी किसानों को भरोसा दिया कि कृषि और डेयरी को इस डील से बाहर रखा जाएगा और जल्द ही आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया जाएगा। लेकिन किसान अब केवल भरोसे से संतुष्ट होने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि किसानों का कहना है कि उन्हें पहले भी कई बार आश्वासन मिल चुके हैं। एमएसपी का मुद्दा भी बैठक में प्रमुखता से उठा। किसान लंबे समय से एमएसपी को लेकर अपनी मांग सरकार के सामने रखते रहे हैं। इस पर केंद्रीय मंत्री ने कृषि मंत्रालय से बातचीत कर किसानों और मंत्रालय के बीच सीधे वार्ता कराने का भरोसा दिया।लेकिन सवाल फिर वही है बातचीत कब होगी, फैसला कब होगा और किसानों को इसका फायदा कब मिलेगा?
हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइनों के मुआवजे का मुद्दा भी किसानों ने उठाया।
खेतों के ऊपर से गुजरने वाली हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइनों के मुआवजे का मुद्दा भी किसानों ने उठाया। सरकार की तरफ से नई नीति बनाने का भरोसा दिया गया। आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग भी रखी गई। किसान नेताओं का कहना है कि जब तक इन मुकदमों की वापसी नहीं होती, तब तक बातचीत को पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता। इसके अलावा किसानों ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को दोबारा लागू करने की मांग की। किसानों की मांग है कि जमीन अधिग्रहण से पहले किसानों की सहमति, उचित मुआवजा और बंजर जमीन को प्राथमिकता देने जैसे प्रावधान फिर से लागू किए जाएं।
बैठक के बाद बाहर निकले किसान नेताओं के चेहरे पर थोड़ी राहत जरूर थी, लेकिन संतोष नहीं था। क्योंकि उनके मुताबिक सरकार ने मांगों को लेकर भरोसा तो दिया है, लेकिन अभी तक कोई ऐसा फैसला सामने नहीं आया है जिससे कहा जा सके कि किसानों की समस्या का समाधान हो गया और यहीं से सरकार पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। सवाल है की क्या किसानों को फिर बातचीत के नाम पर आश्वासन देकर शांत कराने की कोशिश की जा रही है? क्या सरकार किसानों की मांगों का स्थायी समाधान करने के बजाय सिर्फ बैठकों और भरोसों तक मामला सीमित रखना चाहती है? रणनीतिकारों की माने तो पंजाब में चुनावी राजनीति को देखते हुए सरकार किसानों को बातचीत और आश्वासन के जरिए साधने की कोशिश कर रही है। हालांकि इस आरोप पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन किसान अब साफ कह रहे हैं—उन्हें आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए। छह घंटे की बैठक के बाद भी अगर किसान अपनी मांगों को लेकर वापस लौट रहे हैं, तो सवाल सरकार से है आखिर किसानों की मांगें पूरी करने के लिए और कितनी बैठकें होंगी और किसानों को अपने हक के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा?







