क्या मुख्यमंत्री की भी नहीं सुनते अधिकारी? हर बारिश में पानी-पानी क्यों होता है गुरुग्राम

क्या मुख्यमंत्री की भी नहीं सुनते अधिकारी? हर बारिश में पानी-पानी क्यों होता है गुरुग्राम

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गुरुग्राम, 5 सितंबर 2026। साइबर सिटी के नाम से देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी पहचान बनाने वाला गुरुग्राम एक बार फिर बारिश के पानी में घिरा नजर आ रहा है। वर्षों से चली आ रही जल निकासी की समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो सका है। बारिश शुरू होते ही शहर की सड़कें, गलियां और निचले इलाके जलमग्न हो जाते हैं। कई प्रमुख मार्गों पर यातायात व्यवस्था चरमरा जाती है और लोगों को घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है।

हालात यह हैं कि शनिवार को भी भारी बारिश की आशंका के बीच गुरुग्राम जिला प्रशासन को लोगों से गैर-जरूरी यात्रा से बचने और जलभराव वाले रास्तों, अंडरपास तथा निचले इलाकों से दूर रहने की अपील करनी पड़ी। हालिया बारिश में शहर के कई हिस्सों में जलभराव और यातायात प्रभावित होने की खबरें सामने आई हैं।

हर साल वही समस्या, हर साल वही दावे

गुरुग्राम में जलभराव की समस्या कोई नई नहीं है। मानसून आने से पहले प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की ओर से नालों की सफाई, पंपों की व्यवस्था और संवेदनशील स्थानों पर इंतजाम पूरे करने के दावे किए जाते हैं।

इस साल भी सरकार की ओर से जलभराव रोकने के लिए कई संवेदनशील स्थानों पर काम पूरा किए जाने की जानकारी दी गई थी। जून में हरियाणा सरकार की ओर से बताया गया था कि पिछले साल चिन्हित 158 संवेदनशील स्थानों पर सुधारात्मक कार्य पूरे कर लिए गए हैं और आगामी मानसून में राहत मिलने की उम्मीद है।

लेकिन बारिश होते ही कई इलाकों में तस्वीर फिर बदल जाती है। यही वजह है कि अब सवाल केवल जलभराव का नहीं, बल्कि हर साल किए जाने वाले दावों और उनके जमीनी असर का भी है।

क्या मुख्यमंत्री की भी नहीं सुनते अधिकारी?

हरियाणा सरकार गुरुग्राम को प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और औद्योगिक केंद्र मानती है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी समय-समय पर गुरुग्राम से जुड़े विकास कार्यों और बुनियादी सुविधाओं की समीक्षा करते रहे हैं।

इसके बावजूद अगर मुख्यमंत्री स्तर पर समीक्षा और निर्देशों के बाद भी बारिश के दौरान शहर की सड़कों पर पानी भरता है, ट्रैफिक व्यवस्था प्रभावित होती है और लोगों को घरों में रहने की सलाह देनी पड़ती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर समस्या का समाधान जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देता?

सवाल यह भी है कि क्या अधिकारियों की कार्यप्रणाली और योजनाओं के क्रियान्वयन की पर्याप्त निगरानी हो रही है?

बारिश आते ही ‘वर्क फ्रॉम होम’ की नौबत

गुरुग्राम देश के प्रमुख कॉरपोरेट और आईटी हब में शामिल है। यहां हजारों कंपनियां और बड़ी संख्या में कर्मचारी काम करते हैं। ऐसे में हर तेज बारिश के बाद जब लोगों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने या घर से काम करने की सलाह दी जाती है, तो यह शहर की बुनियादी सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

आज भी स्थिति यह है कि कुछ घंटे की तेज बारिश शहर के कई हिस्सों में यातायात को प्रभावित कर देती है। हाल की बारिश में भी प्रमुख सड़कों पर जलभराव के कारण यातायात बाधित हुआ।

अरबों के विकास के बावजूद ड्रेनेज क्यों कमजोर?

गुरुग्राम में विकास कार्यों के लिए कई सरकारी एजेंसियां जिम्मेदार हैं। गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण (GMDA), नगर निगम गुरुग्राम और हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) जैसी संस्थाएं सड़क, सीवर, ड्रेनेज और शहरी बुनियादी ढांचे से जुड़े कार्य करती हैं।

शहर की आबादी और रियल एस्टेट का विस्तार तेजी से हुआ है। लेकिन सवाल यही है कि क्या जल निकासी का नेटवर्क भी उसी गति से विकसित हुआ?

यदि करोड़ों-अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद हर मानसून में वही जलभराव देखने को मिलता है, तो योजनाओं की प्राथमिकता, डिजाइन और क्रियान्वयन की समीक्षा जरूरी हो जाती है।

केवल पंप लगाकर नहीं निकलेगा पानी

गुरुग्राम के जलभराव को लेकर खुद गुरुग्राम के सांसद और केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।

राव इंद्रजीत सिंह ने हाल में कहा कि गुरुग्राम की जलभराव की समस्या स्थायी है और इसे केवल टुकड़ों में किए जाने वाले उपायों से हल नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्राकृतिक जल निकासी मार्गों की मैपिंग, अतिक्रमण हटाने और बारिश के पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करने की जरूरत पर जोर दिया है।

उन्होंने यह भी कहा है कि केवल पानी को पंप करके बाहर निकालना स्थायी समाधान नहीं है। वर्षों के निर्माण और शहरी विस्तार के कारण प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बाधित हुए हैं, जिससे बारिश का पानी कई इलाकों में जमा हो जाता है।

राव इंद्रजीत ने मुख्यमंत्री से मांगा अधिकारियों से जवाब

अगस्त में भीषण जलभराव के बाद राव इंद्रजीत सिंह ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से मुलाकात कर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की थी। उन्होंने सवाल उठाया था कि जब मानसून से पहले अधिकारियों ने जलभराव नहीं होने का भरोसा दिलाया था, तो बारिश के बाद उनके दावे क्यों विफल हो गए।

राव ने प्राकृतिक नालों और पुराने जल प्रवाह मार्गों पर अतिक्रमण की समस्या को भी उठाया और इन रास्तों का सर्वे कराने की मांग की।

मनोहर लाल के समय से चली आ रही समस्या

गुरुग्राम के जलभराव की समस्या केवल वर्तमान सरकार के कार्यकाल तक सीमित नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल के कार्यकाल में भी शहर की जल निकासी को लेकर कई योजनाएं और घोषणाएं हुईं।

अब सरकार बदलने के बावजूद समस्या का मूल स्वरूप काफी हद तक वही है—बारिश होती है, सड़कें जलमग्न होती हैं, ट्रैफिक रेंगने लगता है और प्रशासन को एडवाइजरी जारी करनी पड़ती है।

यानी सवाल किसी एक सरकार या एक अधिकारी का नहीं, बल्कि गुरुग्राम के दशकों पुराने शहरी नियोजन और ड्रेनेज सिस्टम का है।

प्राकृतिक नालों पर अतिक्रमण बना बड़ा मुद्दा

गुरुग्राम में प्राकृतिक जल प्रवाह के रास्तों पर निर्माण का मुद्दा लगातार उठता रहा है। राव इंद्रजीत सिंह ने भी हालिया बैठकों में प्राकृतिक नालों और जल निकासी मार्गों को अतिक्रमण मुक्त कराने की जरूरत बताई है।

उन्होंने अधिकारियों से उन बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी भी मांगी है, जिन पर प्राकृतिक नालों पर अतिक्रमण के आरोप लगे हैं।

यदि प्राकृतिक जल प्रवाह के रास्ते बंद हो जाते हैं और शहर का ड्रेनेज सिस्टम बारिश के पानी की मात्रा को संभालने में सक्षम नहीं होता, तो पंप लगाकर कुछ घंटों के लिए पानी निकालना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

ट्रैफिक व्यवस्था भी होती है चौपट

जलभराव का सीधा असर गुरुग्राम की ट्रैफिक व्यवस्था पर पड़ता है। प्रमुख सड़कों, चौराहों और अंडरपास में पानी भरने के बाद वाहनों की रफ्तार थम जाती है।

2 सितंबर को हुई भारी बारिश के बाद भी गुरुग्राम की कई प्रमुख सड़कों पर जलभराव हुआ और दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेसवे सहित कई मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ।

इसका असर केवल आम लोगों पर नहीं बल्कि स्कूल बसों, कर्मचारियों, आपातकालीन सेवाओं और कारोबारी गतिविधियों पर भी पड़ता है।

अधिकारी पर कार्रवाई, लेकिन सवाल बड़ा है

जलभराव के दौरान ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के मामले में नगर निगम गुरुग्राम ने एक जूनियर इंजीनियर को निलंबित भी किया है। यह कार्रवाई बताती है कि प्रशासन अब जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठा रहा है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल एक-दो कर्मचारियों पर कार्रवाई से वर्षों पुरानी समस्या खत्म हो जाएगी?

जरूरत एक ऐसी व्यवस्था की है जिसमें बारिश से पहले ही पूरे शहर के जल प्रवाह की समीक्षा हो, प्राकृतिक नालों की मैपिंग हो, अतिक्रमण हटाया जाए, मास्टर ड्रेन की क्षमता बढ़ाई जाए और सभी एजेंसियों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी तय हो।

गुरुग्राम को चाहिए स्थायी समाधान

गुरुग्राम की पहचान सिर्फ ऊंची इमारतों, कॉरपोरेट कार्यालयों और साइबर सिटी के रूप में नहीं होनी चाहिए। एक आधुनिक शहर की पहचान उसकी बुनियादी सुविधाओं से भी होती है।

जरूरत है कि सरकार और प्रशासन हर मानसून में राहत और बचाव की तैयारी करने के बजाय दीर्घकालिक ड्रेनेज मास्टर प्लान पर काम करें।

बारिश के पानी को प्राकृतिक रास्ता देना, पुराने नालों और जल निकासी चैनलों को बहाल करना, अतिक्रमण हटाना, जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, बारिश के पानी का संचयन करना और नए निर्माण को वैज्ञानिक ड्रेनेज व्यवस्था से जोड़ना ही स्थायी समाधान की दिशा हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल

गुरुग्राम में मुख्यमंत्री स्तर से लेकर स्थानीय प्रशासन तक लगातार बैठकों और योजनाओं के बावजूद यदि हर बारिश में शहर जलमग्न हो जाता है, तो सवाल उठना लाजिमी है—

क्या मुख्यमंत्री के निर्देशों का जमीनी स्तर पर सही तरीके से पालन हो रहा है?

क्या अधिकारी केवल मानसून से पहले कागजों पर तैयारी पूरी कर रहे हैं?

और सबसे अहम—

आखिर साइबर सिटी गुरुग्राम को हर बारिश में तालाब बनने से कब मुक्ति मिलेगी?

अब गुरुग्राम की जनता को नए आश्वासनों से ज्यादा जमीन पर दिखाई देने वाले स्थायी समाधान का इंतजार है।

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Author: New India News Network

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