- दिल्ली में पहली बार आयोजित ‘भारतीय संत महापरिषद को आचार्य लोकेशजी ने संबोधित किया
- वसुधैव कुटुंबकम’ और अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की शक्ति – आचार्य लोकेश
- विश्व शांति, समरसता और मानव बंधुत्व के लिए भारतीय संत महापरिषद ने लिया महासंकल्प
नई दिल्ली, 19 मई 2026 ।
भारत की राजधानी दिल्ली में पहली बार ‘भारतीय संत महापरिषद’ के तत्वावधान में संतों एवं आचार्यों का भव्य वैश्विक महासमागम आयोजित किया गया। इस ऐतिहासिक आयोजन में अहिंसा विश्व भारती एवं विश्व शांति केंद्र के संस्थापक आचार्य लोकेशजी, सहित देश-विदेश से समागत 300 से अधिक धर्माचार्यों एवं आध्यात्मिक नेताओं ने सहभागिता कर विश्व शांति, वैश्विक समरसता और विश्व बंधुत्व के लिए सशक्त एवं संस्कारित समाज निर्माण का महासंकल्प लिया।
भारतीय संत महापरिषद के आयोजक हरिहरपुरा महास्वामी सच्चिदानंद सरस्वती जी, कैलाश आश्रम से आचार्य महामण्डलेश्वर जयेन्द्र पुरी स्वामीजी ने इस अवसर पर शंकराचार्य, जगतगुरु, आचार्य, महामंडलेश्वर, एवं देश भर से समागत साधु संतों का स्वागत किया इस अवसर पर रामजन्म भूमि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंददेव गिरी जी महाराज, आचार्य महासभा के महासचिव स्वामी परमात्मानंद, आदिचुनचुनगिरी मठ के जगतगुरु स्वामी निर्मलानन्द , जैन धर्म से आचार्य लोकेश , सिख धर्म से बांग्ला साहिब गुरुद्वारे के प्रमुख जत्थेदार भाई रंजीत सिंह, बौद्ध धर्म से बौद्ध भिखु लामा , शंकराचार्य राजराजेश्वर, हिन्दू परंपरा से बड़ी संख्या में साधु संत उपस्थित थे |
विश्व शांति दूत आचार्य लोकेश ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘अनेकता में एकता’ जैसे आदर्श आज पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक हैं। यदि मानवता इन मूल्यों को अपनाए, तो विश्व में शांति, समानता, सद्भाव और बंधुत्व की स्थापना संभव है। उन्होंने कहा कि संत समाज का दायित्व केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता को जोड़ना और समाज को सकारात्मक दिशा देना भी है।
रामकृष्ण मिशन में आयोजित इस महासमागम में भारतीय संस्कृति को अपना मूल आधार मानने वाली विभिन्न आस्थाओं, दर्शनों एवं परंपराओं के संतों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि ‘भारतीय संत महापरिषद’ को एक सुव्यवस्थित एवं प्रभावशाली महासंघ के रूप में विकसित किया जाएगा, जो भारतीय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन हेतु कार्य करेगा।
इस अवसर पर दो महत्वपूर्ण योजनाओं ‘समान अनुष्ठान संहिता’ एवं ‘एकसमान सामान्य संस्कार शिक्षा’ को संयुक्त रूप से प्रारंभ करने की रूपरेखा भी तैयार की गई।’समान अनुष्ठान संहिता’ का उद्देश्य विभिन्न आस्थाओं, परंपराओं और दर्शनों के मूल आध्यात्मिक मूल्यों को एकजुट कर व्यवस्थित रूप से समाज में स्थापित करना है, जबकि ‘एकसमान सामान्य संस्कार शिक्षा’ का लक्ष्य बच्चों एवं युवाओं को मूल्य आधारित संस्कार शिक्षा प्रदान कर सुसंस्कृत, नैतिक एवं आदर्श समाज का निर्माण करना है।







