न्यू दिल्ली 17 अगस्त / हरियाणा की राजनीति में राव इंद्रजीत सिंह का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। करीब पांच दशक के राजनीतिक सफर में विधायक से लेकर केंद्र में मंत्री और लगातार छह बार सांसद बनने तक उन्होंने लंबी राजनीतिक पारी खेली है। दक्षिण हरियाणा और अहीरवाल की राजनीति में उनका प्रभाव भी लगातार चर्चा का विषय रहा है। लेकिन उनकी राजनीति का एक दूसरा पहलू भी बार-बार सामने आता है -अपनी ही पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री के साथ मतभेद। सवाल यही है कि आखिर राव इंद्रजीत की अपने ही दल के नेताओं से क्यों नहीं बनती? और खासकर मुख्यमंत्री के साथ उनके रिश्तों में बार-बार तल्खी क्यों दिखाई देती है

14 अगस्त 2026 को गुरुग्राम में आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति कार्यक्रम ने इस सवाल को फिर हवा दे दी। कार्यक्रम में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल समेत पार्टी के कई बड़े नेता मौजूद थे। रिपोर्टों के मुताबिक राव इंद्रजीत ने मंच से इस बात पर नाराजगी जताई कि क्षेत्र का सांसद होने के बावजूद उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया गया और उनका नाम वक्ताओं की सूची में नहीं था। इसके बाद वह अपनी सीट पर चले गए।घटना छोटी लग सकती है, लेकिन राजनीतिक मायने बड़े हैं।सवाल यह है कि क्या यह महज प्रोटोकॉल का मामला था या इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक असहजता भी है?क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब राव इंद्रजीत ने अपनी ही पार्टी की सरकार के सामने दक्षिण हरियाणा के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का सवाल उठाया हो। कांग्रेस में रहते हुए उनके तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ मतभेद सामने आए। बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 2014 में बीजेपी में शामिल हो गए। उस समय भी राजनीतिक गलियारों में उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं की चर्चा हुई, लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर लाल बने और राव इंद्रजीत केंद्र की राजनीति में चले गए।इसके बावजूद दक्षिण हरियाणा की हिस्सेदारी का सवाल उनके राजनीतिक बयानों में बना रहा।
2024 में मुख्यमंत्री बदले। मनोहर लाल की जगह नायब सिंह सैनी मुख्यमंत्री बने। लेकिन राव इंद्रजीत की नाराजगी से जुड़ी राजनीतिक चर्चाएं खत्म नहीं हुईं। अब ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है की क्या समस्या मुख्यमंत्री के नाम से है या सत्ता में अपने राजनीतिक प्रभाव की हिस्सेदारी से?कांग्रेस में हुड्डा से मतभेद।बीजेपी में मनोहर लाल के दौर में हिस्सेदारी का सवाल।और अब नायब सिंह सैनी सरकार में भी नाराजगी की चर्चाएं।तो क्या मुख्यमंत्री कोई भी हो, राव इंद्रजीत के राजनीतिक सवाल वही रहते हैं? राव इंद्रजीत की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत अहीरवाल और दक्षिण हरियाणा माना जाता है। गुरुग्राम लोकसभा सीट से लगातार जीत और क्षेत्र में उनके लंबे राजनीतिक प्रभाव ने उन्हें बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण नेता बनाया है।लेकिन यही उनकी ताकत एक और सवाल खड़ा करती है अगर दक्षिण हरियाणा में उनका इतना मजबूत राजनीतिक आधार है, तो पार्टी नेतृत्व उनकी सार्वजनिक नाराजगी को नजरअंदाज कैसे कर सकता है?और अगर पार्टी नेतृत्व उनकी बात नहीं मानता, तो फिर राव इंद्रजीत की राजनीतिक ताकत आखिर कितनी है?विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने दक्षिण हरियाणा के कई क्षेत्रों में जीत हासिल की है। बावल, कोसली, रेवाड़ी, पटौदी, बादशाहपुर, गुरुग्राम, सोहना और अटेली जैसे क्षेत्रों में बीजेपी का राजनीतिक प्रभाव है।इनमें कुछ नेताओं को राव इंद्रजीत के करीबी या समर्थक खेमे से जोड़ा जाता रहा है, हालांकि हर विधायक को सीधे उनका समर्थक कहना राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा।

अगर राव इंद्रजीत के साथ इतने विधायक हैं, तो क्या वह पार्टी के भीतर समानांतर राजनीतिक शक्ति केंद्र हैं?
और अगर विधायक उनके साथ नहीं हैं, तो फिर पार्टी नेतृत्व से लगातार टकराने की उनकी राजनीतिक ताकत का आधार क्या है?इसी कड़ी में राव नरबीर सिंह का नाम भी महत्वपूर्ण हो जाता है। दोनों आज बीजेपी में हैं, लेकिन दोनों का राजनीतिक इतिहास पुरानी प्रतिस्पर्धा से जुड़ा रहा है। 1987 के जाटूसाना विधानसभा चुनाव में राव नरबीर सिंह ने राव इंद्रजीत को हराया था। आज वही राव नरबीर सिंह हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।तो क्या दक्षिण हरियाणा की राजनीति में यह पुरानी प्रतिस्पर्धा आज भी प्रभाव डालती है?या दोनों नेताओं के बीच की राजनीतिक दूरी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है?इसका जवाब भी दोनों नेताओं से ही अपेक्षित है।
और अगर विधायक उनके साथ नहीं हैं, तो फिर पार्टी नेतृत्व से लगातार टकराने की उनकी राजनीतिक ताकत का आधार क्या है?इसी कड़ी में राव नरबीर सिंह का नाम भी महत्वपूर्ण हो जाता है। दोनों आज बीजेपी में हैं, लेकिन दोनों का राजनीतिक इतिहास पुरानी प्रतिस्पर्धा से जुड़ा रहा है। 1987 के जाटूसाना विधानसभा चुनाव में राव नरबीर सिंह ने राव इंद्रजीत को हराया था। आज वही राव नरबीर सिंह हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।तो क्या दक्षिण हरियाणा की राजनीति में यह पुरानी प्रतिस्पर्धा आज भी प्रभाव डालती है?या दोनों नेताओं के बीच की राजनीतिक दूरी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है?इसका जवाब भी दोनों नेताओं से ही अपेक्षित है।

अब राव इंद्रजीत के परिवार और मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखिए।राव इंद्रजीत खुद केंद्र में मंत्री हैं। लगातार छह बार सांसद हैं। उनकी बेटी आरती राव अटेली से विधायक हैं और नायब सिंह सैनी सरकार में मंत्री हैं।ऐसे में सवाल है की जब परिवार सत्ता के इतने महत्वपूर्ण पदों पर है, तो राव इंद्रजीत को आखिर किस हिस्सेदारी की कमी महसूस होती है? क्या प्रतिनिधित्व और सम्मान में कमी है या मामला प्रोटोकॉल का है?या फिर सत्ता में राजनीतिक हिस्सेदारी का?राजनीतिक गलियारों में एक धारणा यह भी रही है कि राव इंद्रजीत सत्ता के बाहर रहने के बजाय सत्ता के भीतर प्रभावशाली भूमिका को प्राथमिकता देते हैं। उनके राजनीतिक सफर को देखते हुए यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या उनकी नजर कभी मुख्यमंत्री पद पर रही है।
लेकिन यह राजनीतिक धारणा है, प्रमाणित तथ्य नहीं।
लेकिन यह राजनीतिक धारणा है, प्रमाणित तथ्य नहीं।
राव इंद्रजीत सिंह न कांग्रेस में मुख्यमंत्री बने न बीजेपी में अब ऐसे में सवाल है की क्या मुख्यमंत्री पद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उनकी नाराजगी की वजहों में से एक है?और अगर ऐसा नहीं है, तो फिर हर मुख्यमंत्री के साथ मतभेद की तस्वीर क्यों बनती है?अब सबसे बड़ा सवाल पार्टी नेतृत्व से भी है अगर राव इंद्रजीत बार-बार सार्वजनिक मंचों से अपनी ही पार्टी के नेतृत्व और सरकार पर सवाल उठाते हैं, तो पार्टी कार्रवाई क्यों नहीं करती?
क्या बीजेपी उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती? क्या दक्षिण हरियाणा में उनका राजनीतिक प्रभाव इतना महत्वपूर्ण है कि पार्टी टकराव से बचती है?या फिर पार्टी मानती है कि यह नाराजगी संगठन के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं है?राव इंदरजीत पर भी सवाल खड़े होते है की क्या आपकी लड़ाई दक्षिण हरियाणा के हक की है या राजनीतिक हिस्सेदारी की? अगर हक की लड़ाई है, तो दक्षिण हरियाणा को कितना हक मिला? अगर सम्मान की लड़ाई है, तो सत्ता में रहते हुए भी सम्मान की कमी क्यों महसूस होती है?और अगर मामला राजनीतिक हिस्सेदारी का है।
तो क्या आपकी नाराजगी सरकार से है, पार्टी नेतृत्व से है या उस राजनीतिक हैसियत से कम हिस्सेदारी मिलने से है, जिसके आप खुद को हकदार मानते हैं?हरियाणा की राजनीति में राव इंद्रजीत एक बड़ा नाम हैं।लेकिन बड़ा नाम होने के साथ सवाल भी बड़े होते हैं।और फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है राव इंद्रजीत की राजनीति आखिर हक की लड़ाई है, राजनीतिक दबदबे की लड़ाई है या सत्ता में उस हिस्सेदारी की तलाश, जिसे वह अपनी राजनीतिक हैसियत के मुताबिक अपना अधिकार मानते हैं?
क्या बीजेपी उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती? क्या दक्षिण हरियाणा में उनका राजनीतिक प्रभाव इतना महत्वपूर्ण है कि पार्टी टकराव से बचती है?या फिर पार्टी मानती है कि यह नाराजगी संगठन के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं है?राव इंदरजीत पर भी सवाल खड़े होते है की क्या आपकी लड़ाई दक्षिण हरियाणा के हक की है या राजनीतिक हिस्सेदारी की? अगर हक की लड़ाई है, तो दक्षिण हरियाणा को कितना हक मिला? अगर सम्मान की लड़ाई है, तो सत्ता में रहते हुए भी सम्मान की कमी क्यों महसूस होती है?और अगर मामला राजनीतिक हिस्सेदारी का है।
तो क्या आपकी नाराजगी सरकार से है, पार्टी नेतृत्व से है या उस राजनीतिक हैसियत से कम हिस्सेदारी मिलने से है, जिसके आप खुद को हकदार मानते हैं?हरियाणा की राजनीति में राव इंद्रजीत एक बड़ा नाम हैं।लेकिन बड़ा नाम होने के साथ सवाल भी बड़े होते हैं।और फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है राव इंद्रजीत की राजनीति आखिर हक की लड़ाई है, राजनीतिक दबदबे की लड़ाई है या सत्ता में उस हिस्सेदारी की तलाश, जिसे वह अपनी राजनीतिक हैसियत के मुताबिक अपना अधिकार मानते हैं?









