नई दिल्ली,20 मार्च।
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और बढ़ते तनाव के बीच भारत की विदेश नीति को लेकर देश में सियासत तेज हो गई है। लेकिन इस बार मामला अलग है, क्योंकि विपक्ष के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपनी ही पार्टी के रुख से अलग जाकर नरेंद्र मोदी सरकार की नीति का खुलकर समर्थन किया है। उनका कहना है कि इस संवेदनशील समय में भारत का संतुलित और संयमित रुख ही देश के हित में है।
थरूर ने साफ कहा, “संयम कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है।” उनका मानना है कि भारत को भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच के साथ कदम उठाने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार होती, तो वे उसे भी यही सलाह देते। दरअसल, पश्चिम एशिया में ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया है। इस संघर्ष का असर अब सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया—खासकर भारत पर पड़ रहा है।
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने सरकार की “चुप्पी” पर सवाल उठाते हुए इसे “जिम्मेदारी से बचना” बताया। लेकिन थरूर ने इस आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि यह “चुप्पी नहीं, बल्कि जिम्मेदार कूटनीति” है। थरूर के अनुसार, भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है “रणनीतिक स्वायत्तता”, यानी भारत किसी भी दबाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले ले। यही वजह है कि भारत ने न तो किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन किया और न ही पूरी तरह दूरी बनाई।
हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि भारत को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत पर शोक जताना चाहिए था, क्योंकि शोक व्यक्त करना और निंदा करना दो अलग बातें हैं, और शोक जताना अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार का हिस्सा है। इस बीच कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने भी सरकार के रुख का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि “यह भारत का युद्ध नहीं है” और देश को इसमें संतुलित भूमिका निभानी चाहिए।
अगर भारत पर इस संकट के असर की बात करें, तो सबसे बड़ा प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा है। भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है, ऐसे में आपूर्ति प्रभावित होने और कीमतों के बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। थरूर ने चेतावनी दी कि कच्चे तेल की कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं, जिससे महंगाई बढ़ सकती है। इसके साथ ही रसोई गैस की कमी और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर भी देखने को मिल सकता है।
इसके अलावा, खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता है। यही वजह है कि भारत इस पूरे मामले में बेहद सावधानी और संतुलन के साथ कदम उठा रहा है। भारत ने अब तक बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है—एक तरफ क्षेत्रीय हमलों की आलोचना की है, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बनाए रखने की कोशिश भी की है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यही संतुलित रुख उसकी सबसे बड़ी ताकत है, जो न केवल देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करता है, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया का यह संकट केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति की बड़ी परीक्षा बन चुका है और भारत इसमें बेहद सोच-समझकर आगे बढ़ रहा है।







