नई दिल्ली/हैदराबाद, 11 मई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अपील ने देश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। सोना न खरीदने, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और घर से काम करने की सलाह अब सियासी बहस का केंद्र बन गई है।
प्रधानमंत्री ने वैश्विक परिस्थितियों, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की कीमतों में उछाल को देखते हुए देशवासियों से संयम बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोग एक वर्ष तक सोना न खरीदें, विदेश यात्राएं टालें, ईंधन की खपत कम करें और जहां संभव हो, घर से काम को प्राथमिकता दें। साथ ही खाने के तेल और रासायनिक खाद के उपयोग में भी कमी लाने की बात कही।
प्रधानमंत्री ने कोरोना काल का उदाहरण देते हुए कहा कि देश पहले भी कठिन परिस्थितियों का सामना कर चुका है और अब फिर से सतर्क रहने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि इन कदमों से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और देश आर्थिक दबाव से उबर सकेगा।

राहुल गांधी का हमला
प्रधानमंत्री की इस अपील पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह “उपदेश नहीं, बल्कि नाकामी के सबूत हैं।”
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार अपनी जिम्मेदारी जनता पर डाल रही है और वर्षों के शासन के बाद लोगों को यह बताया जा रहा है कि क्या खरीदें और क्या नहीं।
अखिलेश यादव का सवाल
वहीं समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी प्रधानमंत्री पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि “चुनाव खत्म होते ही संकट याद आ गया।”
अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि जब चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर यात्राएं और खर्च हुए, तब बचत की बातें क्यों नहीं की गईं। उन्होंने यह भी कहा कि इतनी पाबंदियों के बीच पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य कैसे हासिल होगा।
आर्थिक प्रभाव पर चिंता
अखिलेश यादव ने चेतावनी दी कि इस तरह की अपील से बाजार में डर और अनिश्चितता बढ़ सकती है, जिससे मंदी और महंगाई की आशंका पैदा होगी। उन्होंने सरकार पर विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन में विफल रहने का आरोप लगाया।
विपक्ष बनाम सरकार
इस बीच कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी प्रधानमंत्री की अपील को सरकार की नीतियों की असफलता बताया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को जनता पर बोझ डालने के बजाय खुद ठोस कदम उठाने चाहिए।
क्या है असली सवाल?
फिलहाल, प्रधानमंत्री की अपील को जहां एक वर्ग देशहित में जरूरी कदम मान रहा है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की नाकामी बता रहा है।
अब बड़ा सवाल यह है कि यह आर्थिक सतर्कता का संदेश है या सियासी बहस का नया मुद्दा। आने वाले दिनों में इस पर विवाद और तेज होने की संभावना है।







