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हरियाणा में मंत्री, विधायक और सांसद बेबस!

नायब सैनी कल गुरुग्राम में, कार्यकर्ताओं से करेंगे बैठक

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हरियाणा में मंत्री, विधायक और सांसद बेबस! अफसरशाही के आगे जनप्रतिनिधि लाचार, आखिर सरकार चला कौन रहा है?

चंडीगढ़, 25 जून।

हरियाणा में भाजपा सरकार के तीसरे कार्यकाल के दौरान एक ऐसा मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है, जो सत्ता के गलियारों से लेकर गांवों की चौपालों तक पहुंच चुका है। सवाल यह है कि आखिरकार हरियाणा में सरकार चला कौन रहा है? मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक या फिर अफसरशाही?

प्रदेश के कई सांसद, विधायक और मंत्री समय-समय पर अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। आरोप यह है कि अधिकारियों द्वारा न तो जनप्रतिनिधियों के फोन सुने जाते हैं और न ही उनके द्वारा जनता के हित में उठाए गए मामलों को प्राथमिकता दी जाती है। भाजपा विधायकों और मंत्रियों की बैठकों में भी यह मुद्दा कई बार उठ चुका है। वर्ष 2024 में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के साथ हुई बैठकों में भी कुछ विधायकों ने अधिकारियों के कथित पक्षपातपूर्ण रवैये और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी का मुद्दा उठाया था।

हर बैठक में उठता है अधिकारियों का मुद्दा

सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री के साथ होने वाली बैठकों में कई विधायक और मंत्री यह शिकायत कर चुके हैं कि प्रशासनिक स्तर पर उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। उनका कहना है कि जनता उन्हें चुनकर विधानसभा और संसद तक भेजती है, लेकिन जब जनता के कार्य करवाने की बारी आती है तो अधिकारी उनकी सिफारिशों और सुझावों को महत्व नहीं देते।

कई जनप्रतिनिधियों का कहना है कि गांवों में जनता सबसे पहले अपने विधायक और सांसद से जवाब मांगती है। लेकिन जब अधिकारी सहयोग नहीं करते तो जनता के बीच उनकी छवि प्रभावित होती है।

“थानेदार तक नहीं सुनता”

नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कुछ जनप्रतिनिधियों का कहना है कि स्थिति ऐसी हो चुकी है कि उनके कहने पर थानों में हवलदार तक की तैनाती नहीं होती। तहसील और जिला स्तर के प्रशासनिक मामलों में भी उनकी बातों को महत्व नहीं दिया जाता।

कुछ विधायकों का आरोप है कि उनके द्वारा भेजे गए तबादला प्रस्ताव और विकास कार्यों से जुड़ी सिफारिशें महीनों तक लंबित रहती हैं। वहीं कुछ मंत्रियों का कहना है कि उनके विभागों से संबंधित फाइलें भी लंबे समय तक मंजूरी की प्रतीक्षा में रहती हैं, जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता है।

क्या अफसरशाही हो गई है ज्यादा ताकतवर?

हरियाणा की राजनीति में लंबे समय से यह चर्चा चलती रही है कि राज्य में नौकरशाही का प्रभाव लगातार बढ़ा है। कई जनप्रतिनिधि मानते हैं कि अधिकारी केवल शीर्ष स्तर के निर्देशों को प्राथमिकता देते हैं और स्थानीय स्तर पर चुने गए प्रतिनिधियों की बातों को अपेक्षित महत्व नहीं मिलता।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि और प्रशासन एक-दूसरे के पूरक होते हैं। यदि दोनों के बीच तालमेल कमजोर पड़ता है तो इसका सीधा असर विकास कार्यों और जनता की समस्याओं के समाधान पर पड़ता है।

क्या अब भी मनोहर लाल का प्रभाव कायम है?

प्रदेश की राजनीतिक चर्चाओं में एक सवाल यह भी लगातार उठता है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था में अब भी पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री Manohar Lal Khattar का प्रभाव बरकरार है?

जनता के एक वर्ग और राजनीतिक गलियारों में यह धारणा सुनने को मिलती है कि अफसरशाही आज भी खट्टर युग की कार्यशैली के अनुसार काम कर रही है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन राजनीतिक चर्चाओं में यह मुद्दा अक्सर उठता रहता है।

राव इंद्रजीत और अनिल विज भी जता चुके हैं नाराजगी

केंद्रीय राज्य मंत्री Rao Inderjit Singh और वरिष्ठ भाजपा नेता Anil Vij समय-समय पर अपनी ही सरकार की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। राजनीतिक रिपोर्टों में भी यह उल्लेख किया गया है कि दोनों नेताओं द्वारा सरकार और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक टिप्पणियां की जाती रही हैं।

इसी प्रकार परिवहन एवं ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने भी सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि केवल जनता ही नहीं बल्कि मंत्री और विधायक भी सरकार की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट हैं तथा मुख्यमंत्री को अपने मंत्रियों और विधायकों की बात सुननी चाहिए।

राव इंद्रजीत सिंह भी कई मंचों से गुरुग्राम क्षेत्र की परियोजनाओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इससे यह संदेश गया कि सत्ता पक्ष के भीतर भी कई मुद्दों पर असंतोष मौजूद है।

सरकार के सामने चुनौती

मुख्यमंत्री Nayab Singh Saini लगातार यह कहते रहे हैं कि उनकी सरकार मजबूत है और विकास कार्यों को प्राथमिकता दे रही है। सरकार की ओर से स्वास्थ्य, कृषि, जल प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों में कई नई योजनाएं भी लागू की जा रही हैं।

लेकिन दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच तालमेल को लेकर उठ रहे सवाल विपक्ष को भी सरकार पर हमला करने का अवसर दे रहे हैं। यदि यह असंतोष आगे भी बना रहता है तो आने वाले समय में यह भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

बड़ा सवाल

आज हरियाणा की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मंत्री, विधायक और सांसद स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं, तो जनता की समस्याओं का समाधान किसके माध्यम से होगा? क्या सरकार को जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है, या फिर यह केवल राजनीतिक असंतोष और अंदरूनी खींचतान का परिणाम है?

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Author: New India News Network

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