28 मार्च 2026।
देश में धर्मांतरण और आरक्षण को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। मध्य प्रदेश से भाजपा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी ने राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए केंद्र सरकार से सख्त कानून बनाने की मांग की है।
राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान बोलते हुए सोलंकी ने कहा कि संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन छल, दबाव और लालच के जरिए किया गया धर्मांतरण न केवल गैरकानूनी है बल्कि समाज के लिए गंभीर खतरा भी है।
उन्होंने मांग की कि जो लोग धर्म परिवर्तन करते हैं, उन्हें आदिवासी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनके अनुसार, आदिवासी समाज की पहचान उनकी संस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली से जुड़ी होती है। ऐसे में धर्मांतरण के बाद इस पहचान में बदलाव आता है, इसलिए आरक्षण का लाभ जारी रखना उचित नहीं है।
सोलंकी ने सरकार से यह भी अपील की कि धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर किया जाए, जिसे डी-लिस्टिंग कहा जाता है। उनका कहना है कि इससे वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी।
सांसद ने आरोप लगाया कि देश के कई हिस्सों में धर्मांतरण डर, लालच और धोखे के जरिए कराया जा रहा है। लोगों को नौकरी, इलाज, शिक्षा और आर्थिक सहायता का प्रलोभन देकर धर्म बदलवाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि फर्जी विवाह और सामूहिक धर्मांतरण जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जो संगठित अपराध की श्रेणी में आती हैं।
सोलंकी के अनुसार, इन गतिविधियों से न केवल आदिवासी समाज के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपराएं और पहचान भी खतरे में पड़ रही है।
उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन अब पूरे देश के लिए एक सख्त केंद्रीय कानून की जरूरत है।इस दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 24 मार्च 2026 के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस तरह धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त करने की बात कही गई है, उसी तरह की व्यवस्था आदिवासी समाज के लिए भी लागू होनी चाहिए।
सोलंकी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि जबरन धर्मांतरण के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान किया जाए, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और गलत आधार पर धर्म परिवर्तन करने वालों को मिलने वाले लाभों की समीक्षा की जाए।
अंत में सोलंकी ने कहा कि यह केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि देश की सामाजिक संरचना और आदिवासी समाज के भविष्य से जुड़ा विषय है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा करना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है, और इसके लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक है।







