चरखी दादरी: भागवत मर्मज्ञ, व्यासपीठासी स्वामी दंडी स्वामी ब्रह्माश्रम, विश्वनाथ धाम ने कहा है कि भक्ति, ज्ञान, कर्म और प्रेम का समन्वय ही श्रीमद्भागवत के दर्शन का मूल आधार है। दंडी स्वामी ब्रह्माश्रम दादरी नगर की अग्रसेन धर्मशाला परिसर में आयोजित श्री मद भागवत सप्ताह के दौरान भागवत के विविध रूपों की सरल व्याख्या कर रहे थे।उन्होंने कहा कि आज के भौतिकतावादी युग में, जब मनुष्य सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में मानसिक शांति और आत्मिक संतोष की तलाश कर रहा है, तब श्रीमद्भागवत महापुराण की शिक्षाएं जीवन को नई दिशा प्रदान करती हैं। यह ग्रंथ केवल धार्मिक आस्था का आधार नहीं, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय मूल्यों का अनुपम भंडार है। भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं और भागवत के उपदेशों में निहित दर्शन मनुष्य को सत्य, धर्म, करुणा, त्याग और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
ईश्वर के प्रति समर्पण के सिद्धांत मनुष्य को आंतरिक शांति की ओर ले जाते हैं।
श्रीमद्भागवत का प्रमुख संदेश है कि ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति, सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन ही सार्थक जीवन का आधार है। यह ग्रंथ आत्मा की शाश्वतता, संसार की नश्वरता और कर्मों की महत्ता का बोध कराता है। साथ ही, यह अहंकार, लोभ, मोह और ईर्ष्या जैसी प्रवृत्तियों से दूर रहकर समभाव, विनम्रता तथा परोपकार को अपनाने की शिक्षा देता है। इसमें प्रतिपादित निष्काम भक्ति, सत्संग, आत्मज्ञान और ईश्वर के प्रति समर्पण के सिद्धांत मनुष्य को आंतरिक शांति की ओर ले जाते हैं।
श्रीमद्भागवत यह भी संदेश देता है कि सच्चा धर्म केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण की पवित्रता, जीवमात्र के प्रति संवेदना और मानवता की सेवा में निहित है। इसका दर्शन आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि यह भौतिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक विकास और नैतिक मूल्यों के संतुलन का मार्ग दिखाता है। वास्तव में, श्रीमद्भागवत की शिक्षाएं मनुष्य को स्वयं को पहचानने, जीवन के उद्देश्य को समझने और प्रेम, सद्भाव तथा शांति से परिपूर्ण समाज के निर्माण की प्रेरणा देती हैं।







