नई दिल्ली, 09 अपैल।
देश में तेजी से बढ़ते बाल तस्करी के मामलों को लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों ने समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो यह समस्या गंभीर और बेकाबू रूप ले सकती है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि देशभर में संगठित बाल तस्करी गिरोह सक्रिय हैं, जो बच्चों को निशाना बना रहे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह केवल निगरानी कर सकती है, लेकिन वास्तविक कार्रवाई राज्य सरकारों, पुलिस और संबंधित एजेंसियों को ही करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के लापरवाह रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कई राज्यों द्वारा दाखिल की गई रिपोर्ट्स महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं। अदालत के अनुसार, कई राज्यों ने अब तक तय प्रारूप में अनुपालन रिपोर्ट तक प्रस्तुत नहीं की है, जो बेहद चिंताजनक है।
अदालत ने अपने 15 अप्रैल 2025 के फैसले का हवाला देते हुए याद दिलाया कि बाल तस्करी पर रोक लगाने के लिए पहले ही कई अहम निर्देश दिए जा चुके हैं। इनमें छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा करना, एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को मजबूत करना और जांच प्रक्रिया को प्रभावी बनाना शामिल है।
इसके साथ ही कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया था कि वे तस्करी के संभावित हॉटस्पॉट की पहचान करें, उनकी निगरानी के लिए विशेष समितियां बनाएं और हर लापता बच्चे के मामले को तस्करी मानकर जांच शुरू करें, जब तक कि अन्यथा साबित न हो जाए।
हालांकि, अदालत ने पाया कि कई राज्यों ने इन निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि आगे भी लापरवाही जारी रही, तो संबंधित राज्यों को “डिफॉल्टर” घोषित किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि देश के कम से कम 15 राज्यों ने अब तक तस्करी प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी के लिए आवश्यक समितियां गठित नहीं की हैं। इस पर अदालत ने गहरी चिंता जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर दिन बाल तस्करी के नए मामले सामने आ रहे हैं। हालांकि कई मामलों में बच्चों को बचाया भी जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यदि सही प्रयास किए जाएं, तो इस समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
अदालत ने जोर देते हुए कहा कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सक्रियता बेहद जरूरी है। केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे प्रभावी तरीके से लागू करना भी आवश्यक है।
अंत में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले की निगरानी जारी रखेगा और आवश्यकता पड़ने पर आगे भी सख्त निर्देश देगा। साथ ही राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे। इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को निर्धारित की गई है, जहां राज्यों द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा की जाएगी।
Author: New India News Network
new india news network







