भोपाल ,29 जून 2026
तीन साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म और उसकी हत्या के मामले में अदालत ने दोषी को फांसी की सजा सुनाई है। इस जघन्य अपराध की सुनवाई को प्राथमिकता देते हुए अदालत ने महज 60 दिनों के भीतर फैसला सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” श्रेणी में आता है, इसलिए दोषी को मृत्युदंड दिया जाना उचित है।
जानकारी के अनुसार, घटना के बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान घटनास्थल से जुटाए गए भौतिक साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट, गवाहों के बयान और अन्य तकनीकी सबूत अदालत में पेश किए गए। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि प्रस्तुत किए गए साक्ष्य इतने मजबूत थे कि उन्होंने आरोपी के अपराध को संदेह से परे साबित कर दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने निर्धारित समय के भीतर आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद अदालत ने रोजाना सुनवाई करते हुए मामले का तेजी से निपटारा किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों को विस्तार से सुना गया, जिसके बाद अदालत ने आरोपी को दुष्कर्म और हत्या का दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मासूम बच्ची के साथ किया गया अपराध न केवल अमानवीय है, बल्कि समाज की संवेदनाओं को भी झकझोरने वाला है। ऐसे अपराधों में कठोर सजा समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखने और अपराधियों के लिए कड़ा संदेश देने के उद्देश्य से आवश्यक है।
घटना के बाद पीड़ित परिवार ने न्याय की मांग की थी। अदालत के फैसले के बाद परिवार ने न्यायपालिका और जांच एजेंसियों का आभार व्यक्त किया। वहीं, स्थानीय लोगों ने भी फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में त्वरित न्याय से लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि फांसी की सजा पर अंतिम अमल से पहले भारतीय कानून के तहत दोषी को उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार होता है। इसके बाद आवश्यक होने पर मामला उच्चतम न्यायालय तक भी जा सकता है। साथ ही, दोषी के पास दया याचिका दाखिल करने का संवैधानिक अधिकार भी उपलब्ध रहता है। इसलिए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा पर अंतिम क्रियान्वयन कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही संभव होता है।
इस घटना ने एक बार फिर बच्चों की सुरक्षा, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और त्वरित न्याय व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि कठोर कानूनों के साथ-साथ समाज में जागरूकता, बच्चों की सुरक्षा के प्रति सतर्कता और प्रभावी पुलिस व्यवस्था भी ऐसे अपराधों की रोकथाम के लिए बेहद जरूरी है।







