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एक गाँव, टीकला जहाँ आज भी तंबाकू को “ना” कहा जाता है

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30 मई रेवाड़ी

आज के समय में जब तंबाकू, धूम्रपान समाज के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी हैं, तब हरियाणा के रेवाड़ी जिले का टीकला गाँव आज भी एक ऐसी सोच को अपने अंदर जीवित रखे हुए है, जो वर्षों पहले शुरू हुई थी और आज भी लोगों के जीवन में दिखाई देती है।

टीकला गाँव और आसपास के कई क्षेत्रों में बाबा भगवान दास जी को श्रद्धा और विश्वास के साथ याद किया जाता है। लोगों के अनुसार वे एक महान तपस्वी, थे। गाँव के बुज़ुर्गों और पीढ़ियों से चली आ रही बातों के अनुसार उन्होंने लोगों को तंबाकू, हुक्का, धूम्रपान, से दूर रहने की प्रेरणा दी।

उस समय शायद इन चीज़ों को लेकर जागरूकता इतनी नहीं थी, लेकिन फिर भी उन्होंने लोगों को एक अनुशासित और स्वस्थ जीवन जीने का रास्ता दिखाया। यही कारण है कि आज भी कई गाँव इन चीज़ों से दूरी बनाए रखते हैं। कुछ लोग तो तंबाकू को हाथ लगाना तक सही नहीं मानते।

समय के साथ बहुत कुछ बदला। नई पीढ़ियाँ आईं, लोगों की सोच और रहन-सहन बदले, लेकिन फिर भी इस परंपरा की छाप आज तक गाँव में महसूस की जा सकती है। यही बात इस विरासत को खास बनाती है कि बदलते दौर में भी यह सोच पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

“धुआँ नहीं, अच्छे संस्कार फैलाइए।”
“नशा छोड़ो, परिवार और भविष्य जोड़ो।”

बाबा भगवान दास जी के बारे में लिखित या ऑनलाइन जानकारी बहुत कम मिलती है, लेकिन उनकी पहचान आज भी लोगों की आस्था, परंपराओं और जीवन मूल्यों में जीवित है। कुछ विरासतें किताबों से नहीं, लोगों के व्यवहार और विश्वास से पहचानी जाती हैं।

विशेष रूप से बसंत पंचमी और जन्माष्टमी के अवसर पर उनसे जुड़े धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन अवसरों पर अलग-अलग गाँवों और राज्यों से लोग श्रद्धा के साथ आते हैं। यह केवल पूजा का आयोजन नहीं होता, बल्कि लोगों को अच्छे संस्कारों और तबाकू मुक्त जीवन का संदेश देने का भी माध्यम बनता है।

हर वर्ष 31 मई को पूरे विश्व में “International No Tobacco Day” मनाया जाता है। इसी दिन, 31 मई 2007 को, इस परिवार और इस विरासत के पच्चीसवें वंशज राम टोकस का जन्म हुआ। लोग इसे एक विशेष संयोग मानते हैं और इसे नशा-मुक्त जीवन के संदेश से जोड़कर देखते हैं।

आज भी इस परंपरा का उद्देश्य यही है कि समाज, खासकर युवाओं को यह समझाया जाए कि अच्छा जीवन केवल आधुनिक सोच से नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों और पुरानी सीखों से भी बनता है। अनुशासित जीवन की यह सोच पहले भी थी, आज भी है और आने वाली पीढ़ियों तक भी बनी रहे — यही इस विरासत का सबसे बड़ा संदेश है।

यह लेख स्थानीय मान्यताओं, मौखिक परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक कथाओं पर आधारित है।

कुछ लोग इतिहास बन जाते हैं,
और कुछ लोग पीढ़ियों की सोच का हिस्सा।

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Author: New India News Network

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