बिजली मंत्री अनिल विज की कहानी केवल एक सख्त मंत्री की कहानी नहीं है
नई दिल्ली, 9 अगस्त। हरियाणा की राजनीति में कई नेता ऐसे आए, जिन्होंने सत्ता के जरिए अपनी पहचान बनाई। लेकिन कुछ नेता ऐसे भी रहे, जिनकी पहचान पद से ज्यादा उनके तेवरों और काम करने की शैली से बनी। हरियाणा के कैबिनेट बिजली मंत्री अनिल विज उन्हीं नेताओं में शामिल हैं।
अधिकारी हो, मंत्री हो या फिर अपनी ही सरकार का कोई फैसला—अनिल विज कई मौकों पर अपनी बात खुलकर रखने के लिए जाने जाते रहे हैं। जनता दरबार में फरियादियों की लंबी कतार और अधिकारियों से सीधे जवाब मांगने की उनकी शैली ने उन्हें बाकी नेताओं से अलग पहचान दी। इसी सख्त अंदाज के कारण उनके समर्थकों के बीच उन्हें ‘हरियाणा का गब्बर’ तक कहा गया।
लेकिन कैबिनेट बिजली मंत्री अनिल विज की कहानी केवल एक सख्त मंत्री की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, चुनावी हार, राजनीतिक मतभेद, निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत और फिर उसी भाजपा में वापसी की कहानी भी है और आज भी एक सवाल हरियाणा की राजनीति में चर्चा का विषय बना रहता है
क्या अनिल विज कभी हरियाणा के मुख्यमंत्री बनने के मजबूत दावेदार थे?
2024 के विधानसभा चुनाव से पहले खुद कैबिनेट बिजली मंत्री अनिल विज ने मुख्यमंत्री पद को लेकर अपनी दावेदारी की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि यदि जनता की मांग होती है और भाजपा सत्ता में आती है तो वह अपनी वरिष्ठता के आधार पर मुख्यमंत्री पद के लिए दावा पेश करेंगे। हालांकि उस समय भाजपा ने नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए रखा।
15 मार्च 1953: अंबाला कैंट में हुआ जन्म
अनिल विज का जन्म 15 मार्च 1953 को अंबाला कैंट में हुआ। उनके पिता का नाम भीम सेन विज था। छात्र जीवन से ही उनका झुकाव सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों की ओर बढ़ने लगा था। अंबाला के एसडी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह छात्र राजनीति से जुड़े और आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP से जुड़े।
हालांकि राजनीति में पूरी तरह उतरने से पहले उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी भी की। लेकिन सुरक्षित नौकरी और स्थिर भविष्य छोड़कर उन्होंने जनसेवा और राजनीति को अपना रास्ता बनाया। उपलब्ध जीवनी संबंधी रिकॉर्ड के मुताबिक उन्होंने 1974 में SBI ज्वाइन किया था और बाद में राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हुए।
1990: पहली बार विधानसभा पहुंचे

कैबिनेट बिजली मंत्री अनिल विज के राजनीतिक सफर में बड़ा मोड़ साल 1990 में आया। अंबाला कैंट विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ और भाजपा ने अनिल विज को उम्मीदवार बनाया। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ते हुए उन्होंने जीत हासिल की और हरियाणा विधानसभा में प्रवेश किया।
1991 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
राजनीति में यह पहला बड़ा झटका था, लेकिन विज ने हार के बाद राजनीतिक सक्रियता नहीं छोड़ी। उन्होंने जनता के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखी और अगले बड़े राजनीतिक मोड़ की तैयारी शुरू कर दी।
1996: भाजपा से अलग होकर निर्दलीय चुनाव
साल 1996 अनिल विज के राजनीतिक सफर का सबसे अहम मोड़ साबित हुआ। भाजपा से राजनीतिक मतभेदों के बाद उन्होंने पार्टी से अलग होकर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अंबाला कैंट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। अब उनके पास पार्टी संगठन नहीं था। पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं था। लेकिन उनके पास था जनता का भरोसा और इसी भरोसे के दम पर उन्होंने 1996 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत लिया। यह जीत उनके लिए सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं थी। इसने अंबाला कैंट की राजनीति में यह संदेश दिया कि विज का व्यक्तिगत जनाधार पार्टी संगठन से अलग भी मजबूत है।
2000: फिर निर्दलीय जीते
चार साल बाद आया साल 2000। अनिल विज एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे। और जनता ने फिर उनका साथ दिया। विज ने लगातार दूसरी बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अंबाला कैंट विधानसभा सीट जीत ली। यह दौर उनके राजनीतिक करियर में बेहद महत्वपूर्ण था। लगातार दो बार निर्दलीय विधायक बनने के बाद उनकी पहचान एक ऐसे नेता की बन चुकी थी, जो पार्टी संगठन से अलग होकर भी अपने विधानसभा क्षेत्र में चुनाव जीत सकता था।
2005: जीत का सिलसिला टूटा
लेकिन राजनीतिक सफर हमेशा एक जैसा नहीं रहता। 2005 के विधानसभा चुनाव में अनिल विज को हार का सामना करना पड़ा।
इस चुनाव में वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे, लेकिन इस बार जनता का फैसला उनके पक्ष में नहीं आया।
हार के बावजूद विज ने अंबाला कैंट से अपना संपर्क नहीं तोड़ा और इसके बाद उनके राजनीतिक सफर में एक और बड़ा मोड़ आया भाजपा में वापसी।
2009: भाजपा में वापसी और फिर जीत
साल 2009 में अनिल विज भाजपा के टिकट पर एक बार फिर अंबाला कैंट से चुनाव मैदान में उतरे। पार्टी में वापसी के बाद उन्हें जनता का समर्थन फिर मिला और वह विधानसभा पहुंच गए। यह उनके राजनीतिक जीवन का नया अध्याय था। निर्दलीय रहते हुए दो चुनाव जीतने के बाद अब वह फिर भाजपा के संगठन के साथ थे। यहीं से उनकी राजनीति धीरे-धीरे हरियाणा भाजपा के बड़े चेहरों में शामिल होने की दिशा में बढ़ने लगी।
2014: भाजपा सरकार में बड़ी जिम्मेदारी
फिर आया 2014।
हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया। सरकार बनी और कैबिनेट बिजली मंत्री अनिल विज को मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। उनके पास समय-समय पर गृह, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, आयुष, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और खेल जैसे महत्वपूर्ण विभाग रहे। लेकिन मंत्री बनने के बाद भी उनकी राजनीतिक पहचान केवल मंत्रालय की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रही। उनकी कार्यशैली में एक बात लगातार दिखाई दी अधिकारियों से सीधे सवाल और जनता की शिकायतों पर तत्काल प्रतिक्रिया। सरकारी अस्पतालों का निरीक्षण हो, प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक हो या जनता की शिकायत विज कई बार मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेते नजर आए।
जनता दरबार बना राजनीतिक पहचान
अनिल विज के जनता दरबारों ने भी उनकी राजनीतिक छवि को मजबूत किया। लोग अपनी शिकायतें लेकर उनके पास पहुंचते थे।
किसी की समस्या पुलिस विभाग से जुड़ी होती ,किसी की बिजली विभाग से किसी की नगर निकाय से। तो कोई जमीन या प्रशासनिक समस्या लेकर पहुंचता। विज की शैली यह रही कि वह शिकायत सुनने के बाद संबंधित अधिकारी से जवाब मांगते थे। समर्थकों का कहना रहा कि कई मामलों में अधिकारी को मौके पर ही फोन किया जाता और समस्या के समाधान के निर्देश दिए जाते थे। इसी सख्त शैली ने उनके समर्थकों के बीच एक खास पहचान बनाई।
और फिर उन्हें कहा जाने लगा—
‘हरियाणा का गब्बर।’
यह नाम उनके समर्थकों की ओर से उनकी सख्त प्रशासनिक शैली के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया। उनके आलोचक हालांकि उनकी कार्यशैली और कई बयानों पर अलग राय रखते रहे हैं।
अपनी ही सरकार में भी बेबाक
अनिल विज की राजनीति की सबसे चर्चित विशेषताओं में से एक रही उनकी बेबाकी। कई मौकों पर उन्होंने अपनी ही सरकार और पार्टी के भीतर भी अपनी राय खुलकर रखी। 2024 में नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद भी विज की नाराजगी सार्वजनिक रूप से चर्चा में आई थी। यही राजनीतिक अंदाज उनके समर्थकों के लिए उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा।
2024: लगातार सातवीं जीत
फिर आया 2024 का हरियाणा विधानसभा चुनाव।
अंबाला कैंट से भाजपा ने एक बार फिर अनिल विज पर भरोसा जताया। विज ने चुनाव जीता और लगातार सातवीं बार विधानसभा पहुंचे। 2024 के चुनाव में उन्होंने अंबाला कैंट सीट पर 7,248 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इसके बाद नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उनके पास ऊर्जा, परिवहन और श्रम जैसे विभाग रहे।
सुमेर तंवर के बयान से फिर चर्चा
हाल में भाजपा के पूर्व नेता सुमेर तंवर के बयान के बाद यह बहस फिर चर्चा में आई कि क्या अनिल विज मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार हो सकते थे। समर्थक इस तरह के बयानों को विज की राजनीतिक लोकप्रियता और वरिष्ठता की पुष्टि के तौर पर देखते हैं।
वहीं दूसरी तरफ यह भी तर्क दिया जाता है कि मुख्यमंत्री का चयन पार्टी नेतृत्व के व्यापक राजनीतिक आकलन पर निर्भर करता है।
अगर अनिल विज मुख्यमंत्री होते तो?
अब बहस का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है। कुछ समर्थकों का मानना है कि अगर अनिल विज को हरियाणा की मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिलती तो उनकी सख्त प्रशासनिक शैली के कारण सरकार के कामकाज का तरीका अलग होता। उनका तर्क है कि विज अधिकारियों से सीधे जवाब लेने और प्रशासनिक लापरवाही पर सख्त रुख अपनाने के लिए जाने जाते हैं।
अगर अनिल विज के पूरे राजनीतिक सफर को एक नजर में देखें तो तस्वीर बेहद दिलचस्प दिखाई देती है।
1990 — पहली बार विधानसभा चुनाव जीते।
1991 — चुनावी हार।
1996 — निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत।
2000 — दूसरी बार निर्दलीय जीत।
2005 — चुनावी हार।
2009 — भाजपा में वापसी और जीत।
2014 — भाजपा सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री।
2019 — छठी बार विधायक।
2024 — लगातार सातवीं बार विधानसभा में प्रवेश।
यह सिर्फ सत्ता तक पहुंचने की कहानी नहीं है।
यह हार के बाद वापसी की कहानी है।
यह पार्टी से अलग होने के बाद भी जनता के भरोसे चुनाव जीतने की कहानी है।
यह लंबे समय तक एक ही विधानसभा क्षेत्र में अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखने की कहानी है।
और यही वजह है कि अनिल विज की राजनीति को केवल मंत्री पद से नहीं समझा जा सकता।
‘हरियाणा के गब्बर’ की पहचान
अनिल विज को लेकर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है।
किसी के लिए वह ‘हरियाणा के गब्बर’ हैं। किसी के लिए सख्त प्रशासक।
किसी के लिए जनता की आवाज और किसी के लिए हरियाणा के सबसे बेबाक नेताओं में से एक।
लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा के तथ्य यह जरूर बताते हैं कि उन्होंने करीब तीन दशकों से ज्यादा लंबे राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उन्होंने सत्ता भी देखी।
विपक्ष भी देखा।
पार्टी से अलगाव भी देखा।
निर्दलीय राजनीति भी की।
हार भी झेली।
और फिर उसी पार्टी में वापसी करके लगातार चुनावी जीत भी हासिल की।
आज सातवीं बार विधानसभा पहुंचने के बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता बनी हुई है।
यही वजह है कि हरियाणा की राजनीति में अनिल विज का नाम आज भी अलग अंदाज में लिया जाता है।
आखिरी सवाल
लेकिन इन सबके बीच सवाल आज भी वही है—
अगर अनिल विज हरियाणा के मुख्यमंत्री होते, तो क्या प्रदेश की राजनीति और प्रशासन की तस्वीर कुछ अलग होती?
क्या उनकी सख्त प्रशासनिक शैली हरियाणा में बदलाव की नई मिसाल बनती?
क्या सात बार की चुनावी जीत और लंबा राजनीतिक अनुभव उन्हें मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार बनाता है?
या फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए जनाधार के साथ संगठन, नेतृत्व का भरोसा और राजनीतिक समीकरण ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं?
इस सवाल का जवाब हर राजनीतिक विश्लेषक और हरियाणा की जनता अपने-अपने नजरिए से दे सकती है।
लेकिन एक बात तय है—
अंबाला कैंट से शुरू हुआ अनिल विज का राजनीतिक सफर आज हरियाणा की राजनीति की उन कहानियों में शामिल है, जिसमें संघर्ष भी है, हार भी है, निर्दलीय जीत भी है और सात बार विधानसभा पहुंचने की लंबी राजनीतिक पारी भी।






