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मोदी को चिट्ठी पर सियासी बवाल

पाकिस्तान पर फिर छिड़ी बहसशांति की अपील नई दिल्ली , 1 जुलाई--  मोदी को चिट्ठी पर सियासी बवाल पाकिस्तान पर फिर छिड़ी बहसशांति की अपील, बीजेपी हमलावरफारूक-महबूबा पर बीजेपी का वारभारत-पाक रिश्तों पर नया विवादमोदी-शहबाज को खुला पत्रबातचीत की मांग पर घमासान बीजेपी बनाम विपक्ष, नया विवाद पाकिस्तान पर नेताओं की नई पहल खुली चिट्ठी से सियासत गरमाई ।

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पाकिस्तान पर फिर छिड़ी बहसशांति की अपील

नई दिल्ली , 1 जुलाई–  मोदी को चिट्ठी पर सियासी बवाल पाकिस्तान पर फिर छिड़ी बहसशांति की अपील, बीजेपी हमलावरफारूक-महबूबा पर बीजेपी का वारभारत-पाक रिश्तों पर नया विवादमोदी-शहबाज को खुला पत्रबातचीत की मांग पर घमासान बीजेपी बनाम विपक्ष, नया विवाद पाकिस्तान पर नेताओं की नई पहल खुली चिट्ठी से सियासत गरमाई

एक खुली चिट्ठी ने नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है।
क्या पाकिस्तान से फिर बातचीत शुरू होनी चाहिए? क्या आतंकवाद के बीच शांति की अपील सही है, या फिर यह देश की सुरक्षा से समझौता है? यही सवाल इस वक्त देश की राजनीति के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को लिखी गई एक खुली चिट्ठी ने नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। इस चिट्ठी पर फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, आरजेडी सांसद मनोज झा, मीरवाइज उमर फारूक समेत 100 से ज्यादा भारतीय और पाकिस्तानी नेताओं, पूर्व अधिकारियों और बुद्धिजीवियों ने हस्ताक्षर किए हैं।

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को एक खुला पत्र

चिट्ठी में दोनों देशों के बीच बातचीत, व्यापार और कूटनीतिक रिश्तों को फिर से बहाल करने की अपील की गई है। लेकिन बीजेपी ने इसे लेकर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के रुख के खिलाफ बताया है। भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में आई तल्खी के बीच एक बार फिर संवाद की मांग उठी है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस की पहल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को एक खुला पत्र भेजा गया है। इस पत्र पर दोनों देशों की 100 से अधिक प्रमुख हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं।पत्र में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद दोबारा शुरू किया जाना चाहिए।

पत्रकारों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने की भी अपील

अपील में दोनों देशों में उच्चायुक्तों की दोबारा नियुक्ति, सामान्य वीजा सेवाओं की बहाली, अटारी-वाघा बॉर्डर को व्यापार और आम लोगों की आवाजाही के लिए फिर से खोलने, कमर्शियल उड़ानों के लिए हवाई क्षेत्र बहाल करने और जम्मू-कश्मीर समेत सभी लंबित मुद्दों पर व्यापक द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने की मांग की गई है। इसके अलावा करतारपुर साहिब कॉरिडोर और शारदा पीठ तक धार्मिक पहुंच आसान बनाने तथा मीडिया और पत्रकारों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने की भी अपील की गई है।
इस पत्र पर भारत की ओर से फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मनोज झा, मीरवाइज उमर फारूक, पूर्व रॉ प्रमुख ए.एस. दुलत, मणिशंकर अय्यर, जवाहर सरकार, प्रोफेसर सैफुद्दीन सोज और प्रोफेसर अपूर्वानंद समेत कई प्रमुख हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं। वहीं पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी, पूर्व राजदूत अशरफ जहांगीर काजी, शिक्षाविद परवेज हुदभॉय और कई अन्य प्रमुख लोगों ने इस पहल का समर्थन किया है।

भारत और पाकिस्तान को भी संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।

सियासी विवाद को और भड़का दिया है।
चिट्ठी को लेकर उठे विवाद के बीच मीरवाइज उमर फारूक ने इसका बचाव किया है। उनका कहना है कि अगर दुनिया के दूसरे देश युद्ध और तनाव के बाद बातचीत की मेज पर लौट सकते हैं, तो भारत और पाकिस्तान को भी संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। उनके मुताबिक युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है और बातचीत के जरिए ही लंबे समय से लंबित विवादों का हल निकाला जा सकता है। लेकिन इस अपील ने सियासी विवाद को और भड़का दिया है। बीजेपी ने इस पूरे अभियान पर कड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक और सख्त नीति पर आगे बढ़ रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने आरोप लगाया कि इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले कई लोग पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। पूनावाला का आरोप है कि ऐसे समय पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य करने की मांग देश के शहीदों और सुरक्षा बलों के बलिदान का सम्मान नहीं करती।

कार्रवाई के बिना रिश्तों को सामान्य बनाने का सवाल ही नहीं उठता
आपको बता दे की पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की नीति और भी स्पष्ट हो चुकी है। सरकार लगातार यह संदेश देती रही है कि सीमा पार आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना रिश्तों को सामान्य बनाने का सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में यह खुला पत्र सिर्फ शांति की अपील नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक और वैचारिक विवाद का कारण बन गया है।अब सवाल यह है कि क्या आतंकवाद की चुनौती के बीच भारत को पाकिस्तान के साथ फिर से बातचीत शुरू करनी चाहिए, या फिर पहले आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई जरूरी है? फिलहाल यही सवाल देश की राजनीति में नई बहस का केंद्र बना हुआ है।

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Author: New India News Network

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